PADHNA LIKHNA

AISSE BHI BAATEN HOTA HAIN-ऐसी भी बातें होती हैं

#Ch : Saransh-Word Meanings-Muhaware

Class -9 Ganga NCERT New Book : AISSE BHI BAATEN HOTA HAIN-ऐसी भी बातें होती हैं

LEKHAK PARICHAY- यतींद्र मिश्र : परिचय

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यतींद्र मिश्र समकालीन हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि, लेखक, संपादक तथा कला-संस्कृति के गंभीर अध्येता हैं। उनका जन्म सन् 1977 ई. में अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से हिंदी विषय में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की।

यतींद्र मिश्र की रुचि केवल साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि कविता, संगीत, नृत्य, चित्रकला तथा भारतीय संस्कृति के विविध क्षेत्रों में भी उनकी गहरी दिलचस्पी रही है। उनकी रचनाओं में भारतीय सांस्कृतिक परंपरा, संवेदनशीलता और सौंदर्य-बोध का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं—

  1. यदा-कदा
  2. अयोध्या तथा अन्य कविताएँ
  3. ड्योढ़ी पर आलाप

कविता के अतिरिक्त उन्होंने प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत-साधना पर आधारित ‘गिरिजा’ नामक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी। उन्होंने रीतिकाल के अंतिम प्रतिनिधि कवि ‘द्विजदेव’ की ग्रंथावली (2000) का सह-संपादन भी किया।

यतींद्र मिश्र ने प्रसिद्ध कवि कुँवर नारायण पर केंद्रित दो महत्वपूर्ण पुस्तकों का संपादन किया है। इसके अतिरिक्त स्पिक मैके (SPIC MACAY) के लिए आयोजित ‘विरासत-2001’ कार्यक्रम के अंतर्गत भारतीय रूपंकर कलाओं पर आधारित ‘थाती’ नामक ग्रंथ का संपादन भी किया।

वर्तमान में वे स्वतंत्र लेखन के साथ-साथ अर्द्धवार्षिक पत्रिका ‘सहित’ का संपादन कार्य कर रहे हैं। अपनी बहुआयामी प्रतिभा और सांस्कृतिक दृष्टि के कारण यतींद्र मिश्र हिंदी साहित्य और भारतीय कला-जगत में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं।


संक्षिप्त बिंदुओं में (Exam Point of View)

  • नाम : यतींद्र मिश्र
  • जन्म : 1977 ई., अयोध्या (उत्तर प्रदेश)
  • शिक्षा : एम.ए. (हिंदी), लखनऊ विश्वविद्यालय
  • रुचि के क्षेत्र : कविता, संगीत, ललित कलाएँ, समाज एवं संस्कृति
  • प्रमुख काव्य-संग्रह :
    • यदा-कदा
    • अयोध्या तथा अन्य कविताएँ
    • ड्योढ़ी पर आलाप
  • अन्य महत्वपूर्ण कृति : गिरिजा (गिरिजा देवी के जीवन एवं संगीत-साधना पर आधारित)
  • संपादन कार्य :
    • द्विजदेव ग्रंथावली (2000)
    • कुँवर नारायण पर केंद्रित दो पुस्तकें
    • थाती (विरासत-2001, SPIC MACAY)
  • वर्तमान कार्य : स्वतंत्र लेखन एवं सहित पत्रिका का संपादन

स्मरणीय पंक्ति

"यतींद्र मिश्र समकालीन हिंदी कविता, संगीत और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संवेदनशील हस्ताक्षर हैं।"

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लता मंगेशकर :  परिचय 

"मेरी आवाज़ ही पहचान है" — यह पंक्ति भारत रत्न स्वर-कोकिला लता मंगेशकर के व्यक्तित्व और योगदान को पूरी तरह अभिव्यक्त करती है। अपनी मधुर एवं अमर आवाज़ के बल पर उन्होंने न केवल भारत में, बल्कि पूरे विश्व में भारतीय संगीत को नई पहचान दिलाई।

लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को इंदौर (मध्य प्रदेश) में हुआ। उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर से प्राप्त की। बचपन से ही संगीत के प्रति उनकी गहरी रुचि और समर्पण था।

जीवन में अनेक संघर्षों, चुनौतियों और उतार-चढ़ावों का सामना करने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अपनी अथक साधना, मेहनत और लगन के बल पर वे भारतीय संगीत जगत की सबसे प्रतिष्ठित गायिका बनीं। उनके द्वारा गाए गए हजारों गीत आज भी करोड़ों लोगों के हृदय में बसे हुए हैं।

लता मंगेशकर केवल एक महान गायिका ही नहीं थीं, बल्कि परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को निभाने वाली आदर्श व्यक्तित्व की धनी भी थीं। संगीत के प्रति उनका समर्पण, अनुशासन और संघर्षशीलता प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

भारतीय संगीत की चर्चा लता मंगेशकर के बिना अधूरी मानी जाती है। अपने अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। उनकी सुरीली आवाज़ आज भी भारतीय संगीत की अमूल्य धरोहर के रूप में अमर है।

संक्षिप्त बिंदुओं में (Exam Point of View)

  • नाम : लता मंगेशकर
  • उपनाम : स्वर-कोकिला, भारत की स्वर-साम्राज्ञी
  • जन्म : 28 सितंबर 1929, इंदौर (मध्य प्रदेश)
  • पिता : पंडित दीनानाथ मंगेशकर
  • प्रारंभिक शिक्षा : संगीत की शिक्षा पिता से प्राप्त की
  • विशेषता : मधुर, सुरीली और भावपूर्ण गायकी
  • सम्मान : भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार आदि
  • योगदान : भारतीय संगीत को विश्वभर में प्रतिष्ठा दिलाई
  • प्रेरणा : संघर्ष, समर्पण, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा

स्मरणीय पंक्ति

"लता मंगेशकर की आवाज़ केवल एक स्वर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान है।"

Aisi Bhi Baatein Hoti Han : lata mangeshkar se sakshatka) ऐसी भी बातें होती हैं’ (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) — विस्तृत एवं उच्च स्तरीय सारांश -Summary

यह पाठ प्रसिद्ध साहित्यकार यतींद्र मिश्र द्वारा लिया गया भारत रत्न लता मंगेशकर का एक अत्यंत रोचक, प्रेरणादायक और भावनात्मक साक्षात्कार है। इस साक्षात्कार में लता मंगेशकर अपने जीवन, परिवार, संगीत-साधना, संघर्ष, संस्कार, त्योहारों, सहकर्मियों तथा भारतीय संगीत की परंपराओं से जुड़ी अनेक स्मृतियों को साझा करती हैं। यह केवल एक कलाकार का साक्षात्कार नहीं, बल्कि एक महान व्यक्तित्व की जीवन-यात्रा का दस्तावेज है।


1. संगीत-साधना और प्रशंसकों के प्रति कृतज्ञता

साक्षात्कार की शुरुआत में यतींद्र मिश्र लता मंगेशकर के अप्रतिम संगीत-सफर का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि उनकी आवाज़ ने करोड़ों लोगों के जीवन को प्रेरणा दी है। इसके उत्तर में लता जी अत्यंत विनम्रता से कहती हैं कि उन्हें जो प्रेम और सम्मान मिला है, उसके लिए वे अपने प्रशंसकों की सदैव ऋणी रहेंगी। वे मानती हैं कि श्रोताओं ने उन्हें जितना प्रेम दिया, उतना आभार वे शायद अपने गीतों के माध्यम से भी व्यक्त नहीं कर सकीं।

यह प्रसंग उनकी विनम्रता, कृतज्ञता और सरलता को दर्शाता है।


2. पंडित दीनानाथ मंगेशकर की स्मृतियाँ और संस्कार

लता जी अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर को याद करते हुए बताती हैं कि वे अत्यंत अनुशासनप्रिय, गंभीर और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे। बच्चों को डाँटने की आवश्यकता भी उन्हें नहीं पड़ती थी। केवल उनकी गंभीर दृष्टि ही बच्चों को अपनी गलती का एहसास करा देती थी।

वे बताते हैं कि उनके पिता संगीत के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। उनके नाटकों में शास्त्रीय संगीत और रागदारी का विशेष महत्व होता था। वे संगीत में नए-नए प्रयोग करते थे तथा मराठी रंगमंच पर कर्नाटक और पंजाब के संगीत को भी लेकर आए।

लता जी स्वीकार करती हैं कि अपने पिता से उन्होंने केवल संगीत ही नहीं, बल्कि स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता, सत्य के पक्ष में खड़े रहने का साहस और कठिन परिस्थितियों में भी सम्मानपूर्वक जीने की कला सीखी।


3. बचपन की मासूम यादें और फिल्मों की नकल

लता जी अपने बचपन की अनेक रोचक स्मृतियाँ साझा करती हैं। वे बताती हैं कि वे और उनके भाई-बहन फिल्मों को देखकर उनकी नकल उतारा करते थे। विशेष रूप से ‘संत तुकाराम’ फिल्म का दृश्य उन्हें बहुत याद है, जिसमें तुकाराम स्वर्ग जाते हैं। बच्चे घर में गद्दों और तकियों का ढेर लगाकर स्वर्ग बनाते और स्वयं तुकाराम तथा उनके अनुयायियों की भूमिकाएँ निभाते थे।

यह प्रसंग उनके बालमन की कल्पनाशीलता, पारिवारिक स्नेह और सरल जीवन का सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है।


4. अभिनय से अधिक गायन के प्रति लगाव

लता जी बताती हैं कि उन्होंने अपने प्रारंभिक दिनों में कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया था, किंतु अभिनय उन्हें कभी पसंद नहीं आया। मेकअप करना, कैमरे के सामने अभिनय करना और कृत्रिम भाव प्रकट करना उन्हें अच्छा नहीं लगता था।

उनका वास्तविक प्रेम संगीत और गायन से था। यही कारण है कि उन्होंने अभिनय छोड़कर स्वयं को पूरी तरह पार्श्वगायन के लिए समर्पित कर दिया।


5. संघर्षपूर्ण जीवन और परिवार की जिम्मेदारियाँ

लता जी स्वीकार करती हैं कि उनके जीवन में परिस्थितियाँ कभी पूरी तरह आसान नहीं रहीं। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।

वे दिन-रात रिकॉर्डिंग करती थीं। एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो तक दौड़ती रहती थीं। उनकी सबसे बड़ी चिंता अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करना थी। वे अपने आराम या सुविधाओं की चिंता किए बिना केवल अपने परिवार के भविष्य के लिए कार्य करती रहीं।

यह प्रसंग उनके परिश्रम, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और पारिवारिक उत्तरदायित्व को उजागर करता है।


6. बचपन का सपना और संगीत सम्मान

लता जी बताती हैं कि जब वे छोटी थीं, तब अपने पिता और प्रसिद्ध कलाकारों को मेडल पहनकर मंच पर प्रस्तुति देते हुए देखती थीं। उन्हें भी सपना था कि एक दिन वे इतनी बड़ी कलाकार बनेंगी कि उन्हें भी ऐसे सम्मान और पदक प्राप्त होंगे।

यह सपना बाद में सच हुआ और वे भारत ही नहीं, विश्व की सबसे सम्मानित गायिकाओं में गिनी जाने लगीं।


7. पुराने और नए संगीत की तुलना

यतींद्र मिश्र द्वारा आधुनिक संगीतकारों और पुराने संगीतकारों की तुलना पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में लता जी कहती हैं कि प्रत्येक युग की अपनी विशेषताएँ होती हैं।

पुराने समय में तकनीकी सुविधाएँ बहुत सीमित थीं। तब गायकों और संगीतकारों को विशेष प्रभाव उत्पन्न करने के लिए अनेक प्रयोग और मेहनत करनी पड़ती थी। आज तकनीक ने कार्य को सरल बना दिया है, किंतु पुराने कलाकारों की सृजनात्मकता और समर्पण अद्वितीय था।

वे मानती हैं कि यदि पुराने संगीतकारों को आधुनिक तकनीक मिल जाती, तो वे और भी अद्भुत संगीत रच सकते थे।


8. त्योहारों और पारिवारिक परंपराओं का महत्व

लता जी अपने परिवार में मनाए जाने वाले त्योहारों का भी उल्लेख करती हैं। वे बताती हैं कि उनके घर में होली, दीवाली, दशहरा, नवरात्रि, रामनवमी और गुड़ी पड़वा विशेष उत्साह से मनाए जाते थे।

महाराष्ट्र की परंपराओं, धार्मिक आस्थाओं और पारिवारिक रीति-रिवाजों का विस्तृत वर्णन करते हुए वे बताती हैं कि कैसे इन त्योहारों ने उनके जीवन में सांस्कृतिक मूल्यों को स्थापित किया।


9. वरिष्ठ संगीतकारों के प्रति सम्मान

लता जी बताती हैं कि जब वे फिल्म-जगत में नई थीं, तब प्रत्येक दीवाली पर वे अपने वरिष्ठ संगीतकारों—नौशाद, अनिल विश्वास, रोशन, मदन मोहन आदि—के घर मिठाई लेकर जाती थीं।

एक रोचक प्रसंग में वे बताती हैं कि एक बार वे सुबह-सुबह नौशाद साहब के घर पहुँच गईं। उन्हें लगा कि कोई समस्या हो गई है। जब उन्हें पता चला कि लता जी केवल दीवाली की शुभकामनाएँ देने आई हैं, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए।

यह घटना भारतीय संगीत-जगत में गुरु-शिष्य परंपरा, सम्मान और आत्मीय संबंधों को दर्शाती है।


10. कोरस गायकों के साथ आत्मीय संबंध

लता जी बताती हैं कि उनके समय में कोरस में गाने वाले कलाकारों के साथ उनके बहुत अच्छे संबंध थे। वे उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानती थीं।

रिकॉर्डिंग के दौरान सभी साथ बैठते, बातें करते और आत्मीय वातावरण में काम करते थे। यह प्रसंग लता जी की सादगी, अपनापन और सहयोगी स्वभाव को दर्शाता है।


11. संगीत की अलौकिक शक्ति

साक्षात्कार के अंत में संगीत की शक्ति पर चर्चा होती है। यतींद्र मिश्र तानसेन और स्वामी हरिदास से जुड़ी प्रसिद्ध कथाओं का उल्लेख करते हैं, जिनमें राग दीपक से दीपक जलने और मेघ राग से वर्षा होने की बात कही जाती है।

लता जी इन कथाओं को पूर्णतः सत्य या असत्य नहीं मानतीं, किंतु वे स्वीकार करती हैं कि संगीत में असीम शक्ति होती है। वे उस्ताद अली अकबर ख़ाँ का एक प्रसंग सुनाती हैं, जिसमें अत्यंत भावपूर्ण वादन के दौरान उनके सरोद का तार टूट गया था। उनके अनुसार जब संगीत पूरी आत्मा और समर्पण के साथ प्रस्तुत किया जाता है, तो वह सामान्य सीमाओं से ऊपर उठ जाता है।


12. जीवन-दर्शन और अमरता का विचार

साक्षात्कार के अंतिम चरण में जब यतींद्र मिश्र उन्हें अमर बताते हैं, तो लता जी अत्यंत विनम्रता से कहती हैं कि शरीर अमर नहीं होता, किंतु व्यक्ति का कार्य और उसका नाम अमर हो सकता है।

वे संतोष व्यक्त करती हैं कि उन्होंने अपने पिता के नाम को आगे बढ़ाया और ईश्वर ने उन्हें अपेक्षा से कहीं अधिक सम्मान दिया। अंत में वे सभी कलाकारों और नेक लोगों के लिए ईश्वर से मंगलकामना करती हैं।


निष्कर्ष

‘ऐसी भी बातें होती हैं’ केवल लता मंगेशकर का साक्षात्कार नहीं है, बल्कि यह एक महान कलाकार के व्यक्तित्व, संघर्ष, संस्कार, विनम्रता, कर्तव्यनिष्ठा और संगीत-साधना का प्रेरक दस्तावेज है। इस साक्षात्कार से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सफलता का वास्तविक आधार प्रतिभा के साथ-साथ अनुशासन, परिश्रम, स्वाभिमान, पारिवारिक संस्कार, विनम्रता और निरंतर साधना है। लता मंगेशकर का जीवन इस सत्य का जीवंत उदाहरण है कि सच्ची कला कभी नष्ट नहीं होती; वह कलाकार को अमर बना देती है।

#Textbook Q & A

ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) पाठ के  प्रश्न - उत्तर  Text-based Questions and Answers

ऐसी भी बातें होती हैं" – अभ्यास (उत्तर एवं व्याख्या सहित)

मेरा उत्तर मेरा तर्क

1. लता जी ने अपने पिताजी से क्या-क्या सीखा?

उत्तर – (ग) स्वाभिमान और संघर्ष के साथ जीना

व्याख्या :
लता जी ने बताया है कि उनके पिता ने उन्हें स्वाभिमान से जीने, सही बात पर डटे रहने तथा कठिन परिस्थितियों में भी किसी के आगे हाथ न फैलाने की शिक्षा दी।

2. पिताजी की मृत्यु के बाद परिवार संभालने का लता जी का निर्णय किस जीवन-मूल्य का द्योतक है?

उत्तर – (घ) कर्तव्यनिष्ठा

व्याख्या :
पिता के निधन के बाद लता जी ने परिवार की जिम्मेदारी उठाई। यह उनके कर्तव्यबोध और उत्तरदायित्व को दर्शाता है।

3. "मंगलागौर" के वर्णन से भारतीय समाज की कौन-सी परंपरा उजागर होती है?

उत्तर – (घ) संगीत की महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका

व्याख्या :
मंगलागौर में महिलाएँ गीत गाती हैं, नृत्य करती हैं और सामूहिक उत्सव मनाती हैं। इससे समाज में संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका स्पष्ट होती है।

4. "गाँव गेला वाहून, नाव गेला राहून" का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?

उत्तर – (घ) जीवन अस्थायी है, पर कर्म अमर रहते हैं।

व्याख्या :
लता जी का आशय है कि मनुष्य नश्वर है, लेकिन उसके अच्छे कार्य और नाम सदैव जीवित रहते हैं।

5. कोरस में साथ गाने वाली लड़कियों के साथ लता जी के संबंध कैसे थे?

उत्तर – (ग) आत्मीय

व्याख्या :
लता जी ने बताया कि कोरस की लड़कियाँ उनके परिवार जैसी थीं। वे उनके साथ बैठतीं, बातें करतीं और उनका घर आना-जाना भी था।

6. बाबा दीनानाथ और तानसेन की कथाओं से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?

उत्तर – (घ) संगीत में अप्रत्याशित शक्ति होती है।

व्याख्या :
लता जी मानती हैं कि संगीत में असीम शक्ति होती है और वह कभी-कभी ऐसे प्रभाव उत्पन्न कर सकता है जो सामान्य अनुभव से परे हों।

7. इस साक्षात्कार में लता मंगेशकर की जो छवि उभरती है, वह मुख्यतः कैसी है?

उत्तर – (क) साधना, समर्पण और आत्मसम्मान की

व्याख्या :
पूरे साक्षात्कार में लता जी का व्यक्तित्व एक समर्पित साधक, स्वाभिमानी व्यक्ति और परिवार के प्रति उत्तरदायी सदस्य के रूप में सामने आता है।

मेरी समझ मेरे विचार

1. "पिताजी उस समय पूछते थे, 'समझ गए न?'" ... "अच्छा अब जाओ, बाहर जाकर खेलो।"
प्रश्न: यह प्रसंग पारिवारिक अनुशासन और स्नेह के संतुलन का प्रतीक कैसे है?

उत्तर: यह प्रसंग बताता है कि लता जी के पिता अनुशासनप्रिय थे, परंतु कठोर नहीं थे। वे बच्चों को डाँटने या दंड देने के बजाय अपने व्यवहार से समझाते थे। उनकी गंभीर दृष्टि ही बच्चों को अपनी गलती का एहसास करा देती थी। इसके बाद वे प्रेमपूर्वक उन्हें खेलने भेज देते थे। इस प्रकार उनके व्यवहार में अनुशासन और स्नेह का सुंदर संतुलन दिखाई देता है।

2. लता मंगेशकर पर उनके पिता पं. दीनानाथ मंगेशकर के व्यक्तित्व का क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: लता जी के व्यक्तित्व पर उनके पिता का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने उनसे संगीत, अनुशासन, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस सीखा। पिता के संस्कारों के कारण ही वे संघर्षों के समय भी अडिग रहीं और सफलता के शिखर तक पहुँचीं।

3. "मैंने अपने पिताजी का नाम, थोड़ा ही सही मगर, आगे बढ़ाया।"

प्रश्न: क्या यह केवल प्रसिद्धि प्राप्त करना था या इससे कोई महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व भी जुड़ा था?

उत्तर: यह केवल प्रसिद्धि प्राप्त करने की बात नहीं थी। इसके साथ अपने पिता की प्रतिष्ठा, संस्कारों और संगीत परंपरा को आगे बढ़ाने का उत्तरदायित्व भी जुड़ा था। लता जी ने अपने कार्य, अनुशासन और संगीत साधना से अपने पिता के नाम को सम्मान दिलाया।

4. किसी भी कार्य को पूरा करने में सहयोगियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। साक्षात्कार के आधार पर बताइए कि लता जी के अपने सहयोगियों के साथ संबंध कैसे थे?

उत्तर: लता जी अपने सहयोगियों के प्रति अत्यंत सम्मान और आत्मीयता का भाव रखती थीं। कोरस में गाने वाली लड़कियों से उनके पारिवारिक संबंध थे। वे उनके साथ बैठकर बातें करती थीं और उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानती थीं। इससे उनकी विनम्रता, सहयोग भावना और मानवीय संवेदनशीलता प्रकट होती है।

परीक्षा के लिए याद रखने योग्य मुख्य बिंदु

  • पिता से सीखा → स्वाभिमान, अनुशासन और संघर्ष
  • जीवन-मूल्य → कर्तव्यनिष्ठा
  • संगीत की शक्ति → असीम एवं अप्रत्याशित
  • सहयोगियों के प्रति व्यवहार → आत्मीय और सम्मानपूर्ण
  • व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ → साधना, समर्पण, विनम्रता, आत्मसम्मान
  • जीवन-दर्शन → मनुष्य नश्वर है, कर्म अमर हैं।

साक्षात्कार से उभरता व्यक्तित्व / उभरती छवि

दिए गए कथनों के आधार पर लता मंगेशकर के व्यक्तित्व के गुण:

1. "मुझे अपने गाने और रिकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज़ की सुध नहीं रहती थी।"

उभरता गुण :
एकाग्रता, साधना, समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा

कारण :
लता जी का पूरा ध्यान संगीत और रिकॉर्डिंग पर केंद्रित रहता था। यह उनके समर्पण और एकाग्र साधना को दर्शाता है।

2. "अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।"

उभरता गुण :
स्वाभिमान, आत्मविश्वास, स्पष्टवादिता, दृढ़ता

कारण :
यह कथन बताता है कि लता जी सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े रहने तथा आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने में विश्वास रखती थीं।

3. "आप जैसे लोग अगर यह मानते हैं कि मैं अमर हूँ, तो यह मुझे मिलने वाले उस प्यार जैसा ही है।"

उभरता गुण :
विनम्रता, सरलता, मानवता

कारण :
अपार प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद भी लता जी में अहंकार नहीं था। वे अपने प्रशंसकों के प्रेम को ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती थीं।

4. "मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं।"

उभरता गुण :
दार्शनिकता, स्पष्टता, यथार्थवादिता, सरलता

कारण :
लता जी जीवन के शाश्वत सत्य को स्वीकार करती हैं कि शरीर नश्वर है, लेकिन श्रेष्ठ कर्म और कला अमर हो जाते हैं।

 मेरे प्रश्न

दिए गए वाक्य के आधार पर उत्तर

वाक्य :
"संगीत में असीम शक्ति और अप्रत्याशित रचने की क्षमता होती है।"

1. लता मंगेशकर ने संगीत के विषय में क्या कहा?

उत्तर : लता मंगेशकर ने कहा कि संगीत में असीम शक्ति होती है और वह अप्रत्याशित प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता रखता है।

2. लता मंगेशकर ने संगीत की क्या विशेषताएँ बताई हैं?

उत्तर : लता मंगेशकर के अनुसार संगीत में असीम शक्ति, मन को प्रभावित करने की क्षमता तथा अप्रत्याशित घटनाएँ घटित कर देने की सामर्थ्य होती है।

3. लता मंगेशकर ने संगीत की क्षमता का आकलन करते हुए क्या कहा?

उत्तर : उन्होंने कहा कि संगीत इतना प्रभावशाली होता है कि वह श्रोताओं के मन को गहराई से स्पर्श कर सकता है और कभी-कभी ऐसे अनुभव उत्पन्न कर देता है जो सामान्य रूप से संभव नहीं लगते।

4. उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर के कॉन्सर्ट में हुई घटना से संगीत के बारे में क्या पता चलता है?

उत्तर : कॉन्सर्ट के दौरान उस्ताद अली अकबर खाँ के सरोद का तार टूट गया। उन्होंने कहा कि "जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।" इससे पता चलता है कि संगीत में अद्भुत शक्ति और गहन भावनात्मक प्रभाव होता है। सच्ची साधना और शुद्ध सुर संगीत को असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँचा सकते हैं।

परीक्षा हेतु मुख्य बिंदु

  • एकाग्रता → संगीत के प्रति पूर्ण समर्पण।
  • स्वाभिमान → सही बात पर अडिग रहना।
  • विनम्रता → प्रसिद्धि के बाद भी अहंकार न होना।
  • दार्शनिक दृष्टि → शरीर नश्वर, कला अमर।
  • संगीत की शक्ति → मन को प्रभावित करने और अप्रत्याशित प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता।

'ऐसी भी बातें होती हैं' साक्षात्कार की पड़ताल

साक्षात्कार विधा के मुख्य बिंदुओं के आधार पर इस पाठ से उपयुक्त पंक्तियाँ:

1. साक्षात्कार देने वाले का नाम और जिसका साक्षात्कार लिया गया, उसका नाम

साक्षात्कारकर्ता: यतींद्र मिश्र

साक्षात्कार देने वाली: लता मंगेशकर

पंक्ति :
"यतींद्र मिश्र : दीदी, आपके संगीत की अप्रतिम यात्रा पर बातचीत शुरू करते हैं..."

"लता मंगेशकर : जी, जरूर। आपका बेहद शुक्रिया..."

2. प्रश्नोत्तर

पंक्ति :

यतींद्र मिश्र :
"आपके पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर की वे कौन-सी स्मृतियाँ हैं, जो आज भी आपके स्मरण में जीवित हैं?"

लता मंगेशकर :
"कई बातें हैं। जैसे हम लोग बचपन में जब बहुत शरारत करते थे..."

3. भावनात्मक वातावरण

पंक्ति :
"आपके माध्यम से ही मैं अपने करोड़ों प्रशंसकों का आभार व्यक्त करती हूँ, जो उन्होंने मुझे इतना प्रेम और सम्मान दे रखा है।"

या

"आज मुझे लगता है कि हे प्रभु! तुमने जो भी दिया, वह बहुत दिया..."

4. आमंत्रण, स्वागत और परिचय

पंक्ति :

"इस संवाद में मेरा प्रयास यह रहेगा कि मैं संगीत में आकंठ डूबे हुए आपके महान जीवन की उन दुर्लभ छवियों से करोड़ों प्रशंसकों को मिलवा सकूँ..."

5. उत्तर देने की शैली का संकेत

पंक्ति :

"लता मंगेशकर : (हँसते हुए) अरे! यह तो हम सब भाई-बहन बहुत करते थे।"

या

"लता मंगेशकर : (खिलखिलाकर हँसती हैं) उस समय उषा बहुत छोटी थी..."

6. विचार और उदाहरण

पंक्ति :

"अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।"

उदाहरण :

"मैंने पिताजी में यह बात देखी थी कि हर हालात में कैसे रहना चाहिए।"

7. संस्मरण

पंक्ति :

"एक बार बड़ा मजेदार वाकया हुआ कि मैं नौशाद साहब के घर सुबह करीब साढ़े पाँच बजे पहुँच गई..."

या

"हम कमरे में घर भर के गद्दे-तकिए एक के ऊपर एक रखकर ऊँचा स्वर्ग बनाते थे..."

8. समापन

पंक्ति :

"आज मुझे लगता है कि हे प्रभु! तुमने जो भी दिया, वह बहुत दिया... अपनी कृपा की छाया हर कलाकार और नेक इंसानों पर भी रखना... यही प्रार्थना है।"

परीक्षा हेतु संक्षिप्त उत्तर

साक्षात्कार की प्रमुख विशेषताएँ जो इस पाठ में दिखाई देती हैं—

  • साक्षात्कारकर्ता – यतींद्र मिश्र
  • साक्षात्कार देने वाली – लता मंगेशकर
  • प्रश्नोत्तर शैली
  • आत्मीय एवं भावनात्मक वातावरण
  • परिचय और स्वागत
  • संस्मरणों का प्रयोग
  • विचारों एवं उदाहरणों की प्रस्तुति
  • सहज, स्वाभाविक उत्तर
  • प्रभावशाली समापन

निष्कर्ष :
"ऐसी भी बातें होती हैं" एक उत्कृष्ट साक्षात्कार है जिसमें लता मंगेशकर के जीवन, संघर्ष, संगीत-साधना, पारिवारिक संस्कारों तथा मानवीय मूल्यों का अत्यंत आत्मीय और प्रेरणादायक चित्रण हुआ है।

व्याकरण की बात — मुहावरों का प्रयोग करते हुए वाक्य

1. हाथ में आना (प्राप्त होना)

वाक्य: वर्षों की मेहनत के बाद अंततः उसे सफलता हाथ में आ गई।

2. हाथ का मैल होना (धन को तुच्छ समझना)

वाक्य: दानवीर व्यक्ति के लिए धन हाथ का मैल होता है।

3. हाथ से हाथ मिलाना (सहयोग करना)

वाक्य: हमें स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाने के लिए हाथ से हाथ मिलाना चाहिए।

4. हाथ साफ करना (चोरी करना)

वाक्य: मेले की भीड़ में कुछ चोर लोगों की जेबों पर हाथ साफ कर गए।

5. हाथ से निकल जाना (नियंत्रण से बाहर हो जाना)

वाक्य: समय रहते पढ़ाई न करने के कारण अवसर उसके हाथ से निकल गया।

6. हाथ धो बैठना (किसी वस्तु से वंचित हो जाना)

वाक्य: लालच के कारण व्यापारी अपनी पूरी पूँजी से हाथ धो बैठा।

मेरी भाषा

1. कहावत का अर्थ

"गाँव गेला वाहून, नाव गेला राहून"

हिंदी अर्थ:
"गाँव तो बह जाता है, लेकिन नाम रह जाता है।"

भावार्थ:
मनुष्य का शरीर और भौतिक वस्तुएँ नश्वर हैं, परंतु उसके अच्छे कार्य, कीर्ति और नाम सदैव जीवित रहते हैं। यही संदेश लता मंगेशकर ने भी दिया कि शरीर नश्वर है, पर अच्छा काम और नाम अमर रहता है।

2. अपनी मातृभाषा की एक कहावत

कहावत:

"जैसी करनी, वैसी भरनी।"

अर्थ:

मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है।

भावार्थ:

अच्छे कर्म करने पर अच्छा फल और बुरे कर्म करने पर बुरा फल मिलता है।

3. सेतु चित्र (दो भाषाओं में समान अर्थ वाले शब्द)

हिंदीअंग्रेज़ी
पुस्तकBook
विद्यालयSchool
मित्रFriend
जलWater
माताMother
पिताFather
घरHouse
सूर्यSun
चंद्रमाMoon
प्रेमLove

निष्कर्ष:
भाषाएँ भिन्न हो सकती हैं, किंतु अनेक शब्दों के अर्थ समान होते हैं। यही भाषाओं के बीच एक सेतु (Bridge) का कार्य करते हैं।


#Worksheet

कार्यपत्रिका (Competency Based Worksheet)
पाठ – "ऐसी भी बातें होती हैं" (लता मंगेशकर से साक्षात्कार)

कक्षा – 9 (CBSE नवीनतम परीक्षा-पद्धति के अनुसार)

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

1. लता मंगेशकर ने अपने जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा किसे माना?

(क) यतींद्र मिश्र
(ख) अपनी माता
(ग) पं. दीनानाथ मंगेशकर
(घ) नौशाद साहब

उत्तर: (ग)

2. लता जी के अनुसार संगीत में क्या शक्ति निहित है?

(क) केवल मनोरंजन की
(ख) धन कमाने की
(ग) असीम शक्ति और अप्रत्याशित रचने की
(घ) प्रसिद्धि दिलाने की

उत्तर: (ग)

3. लता जी अभिनय से दूर क्यों हो गईं?

(क) समय नहीं था
(ख) उन्हें गायन अधिक प्रिय था
(ग) परिवार की अनुमति नहीं थी
(घ) अभिनय कठिन था

उत्तर: (ख)

4. "गाँव गेला वाहून, नाव गेला राहून" का आशय है—

(क) गाँव नष्ट हो जाता है
(ख) नाम अमर रहता है
(ग) नदी बहती रहती है
(घ) जीवन व्यर्थ है

उत्तर: (ख)

5. लता जी के व्यक्तित्व का सबसे प्रमुख गुण कौन-सा है?

(क) अहंकार
(ख) विनम्रता
(ग) क्रोध
(घ) प्रतिस्पर्धा

उत्तर: (ख)

कथन–कारण प्रश्न

6.

कथन (A): लता मंगेशकर अपने पिता को आदर्श मानती थीं।
कारण (R): उन्होंने पिता से स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता सीखी।

(क) A और R दोनों सत्य हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
(ख) दोनों सत्य हैं पर R सही व्याख्या नहीं है।
(ग) A सत्य है, R असत्य है।
(घ) A असत्य है, R सत्य है।

उत्तर: (क)

7.

कथन: लता जी को अभिनय पसंद नहीं था।
कारण: उन्हें रिकॉर्डिंग और गायन अधिक प्रिय था।

उत्तर: (क)

8.

कथन: पुराने समय की रिकॉर्डिंग चुनौतीपूर्ण थी।
कारण: उस समय तकनीक बहुत विकसित नहीं थी।

उत्तर: (क)

9.

कथन: लता जी स्वयं को अमर मानती थीं।
कारण: वे कहती थीं कि शरीर नश्वर है।

उत्तर: (ग)

10.

कथन: कोरस गायिकाओं के साथ लता जी का व्यवहार आत्मीय था।
कारण: वे उन्हें परिवार का सदस्य मानती थीं।

उत्तर: (क)

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

11. लता जी ने अपने प्रशंसकों के प्रति आभार क्यों व्यक्त किया?

उत्तर: लता मंगेशकर ने अपने प्रशंसकों का आभार व्यक्त किया क्योंकि उन्होंने उन्हें अपार प्रेम, सम्मान और स्नेह दिया। वे मानती थीं कि श्रोताओं के प्रेम के कारण ही उन्हें इतनी लोकप्रियता मिली। उनका मानना था कि वे अपने गीतों के माध्यम से भी उस प्रेम का पूरा प्रतिदान नहीं दे सकीं।

12. लता जी के पिता का अनुशासन कैसा था?

उत्तर: पं. दीनानाथ मंगेशकर अत्यंत अनुशासनप्रिय थे। वे बच्चों को डाँटते कम थे, किंतु उनकी गंभीर दृष्टि ही बच्चों को अपनी गलती का एहसास करा देती थी। उनका अनुशासन प्रेम और संस्कारों पर आधारित था।

13. लता जी ने स्वाभिमान का पाठ किससे सीखा?

उत्तर: लता जी ने स्वाभिमान का पाठ अपने पिता से सीखा। उन्होंने सिखाया कि कठिन परिस्थितियों में भी आत्मसम्मान बनाए रखना चाहिए और किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना चाहिए। यही शिक्षा उनके जीवन की आधारशिला बनी।

14. लता जी को कोरस गायकों से कैसा लगाव था?

उत्तर: लता जी का कोरस गायकों से पारिवारिक संबंध था। वे उन्हें अपने घर के सदस्यों जैसा मानती थीं। रिकॉर्डिंग के समय उनके साथ बैठकर बातचीत करती थीं और सभी का सम्मान करती थीं।

15. संगीत की शक्ति के बारे में लता जी का क्या विचार था?

उत्तर: लता जी संगीत को असीम शक्ति वाला माध्यम मानती थीं। उनका विश्वास था कि संगीत आत्मा को स्पर्श करता है और कई बार ऐसे अप्रत्याशित प्रभाव उत्पन्न करता है, जिन्हें शब्दों में व्यक्त करना कठिन होता है।लघु उत्तरीय प्रश्न

16. लता जी के व्यक्तित्व पर उनके पिता का क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: लता जी के व्यक्तित्व पर उनके पिता का अत्यंत गहरा प्रभाव था। उन्होंने उनसे स्वाभिमान, अनुशासन, आत्मनिर्भरता और संगीत के प्रति समर्पण सीखा। पिता के संस्कारों ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़ बने रहने की शक्ति दी। वे जीवनभर अपने पिता के आदर्शों पर चलती रहीं।

17. लता जी के बचपन का 'संत तुकाराम' प्रसंग क्या दर्शाता है?

उत्तर: यह प्रसंग उनके बचपन की सादगी, कल्पनाशीलता और अभिनय-रुचि को दर्शाता है। वे भाई-बहनों के साथ फिल्म के दृश्यों की नकल करती थीं। इससे उनके परिवार में प्रेमपूर्ण वातावरण तथा बच्चों की रचनात्मकता का भी परिचय मिलता है।

18. तकनीकी विकास के बारे में लता जी के क्या विचार थे?

उत्तर: लता जी मानती थीं कि पुराने समय में रिकॉर्डिंग तकनीक सीमित थी, इसलिए कलाकारों को अधिक मेहनत करनी पड़ती थी। आधुनिक तकनीक ने संगीत को अधिक सुविधाजनक बना दिया है। उनके अनुसार यदि पुराने संगीतकारों को आज की तकनीक मिलती, तो वे और भी अद्भुत संगीत रचते।

19. त्योहारों के प्रति लता जी का दृष्टिकोण क्या था?

उत्तर: लता जी त्योहारों को केवल उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपरा से जोड़कर देखती थीं। उनके घर में होली, गुड़ी पड़वा, रामनवमी और नवरात्रि श्रद्धा और सादगी के साथ मनाए जाते थे। इन त्योहारों के माध्यम से पारिवारिक एकता और धार्मिक आस्था मजबूत होती थी।

20. "मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं" कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस कथन से लता जी की विनम्रता और जीवन-दर्शन प्रकट होता है। वे मानती थीं कि शरीर नश्वर है, लेकिन अच्छे कार्य और कला अमर हो जाते हैं। उनके गीत सदैव लोगों के हृदयों में जीवित रहेंगे, इसलिए उनका संगीत अमर है।

केस स्टडी आधारित प्रश्न

गद्यांश – 1

"मुझे अपने गाने और रिकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज़ की सुध नहीं रहती थी..."

21. यह कथन लता जी के किस गुण को दर्शाता है?

उत्तर :यह कथन लता मंगेशकर की एकाग्रता, समर्पण और कर्मनिष्ठा को दर्शाता है। वे अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह समर्पित थीं। संगीत उनके जीवन का केंद्र था। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने कार्य को प्राथमिकता दी। उनकी सफलता का रहस्य यही निरंतर अभ्यास और लगन थी।

22. इस कथन से विद्यार्थियों को क्या प्रेरणा मिलती है?

उत्तर :विद्यार्थियों को यह प्रेरणा मिलती है कि सफलता के लिए लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। निरंतर मेहनत, अनुशासन और समर्पण से ही उत्कृष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। कठिनाइयों के बावजूद अपने उद्देश्य से विचलित नहीं होना चाहिए।

23. लता जी के जीवन में परिवार की क्या भूमिका थी?

उत्तर : परिवार लता जी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आधार था। पिता के निधन के बाद उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने अपने भाई-बहनों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अथक परिश्रम किया। परिवार के प्रति उनका समर्पण अनुकरणीय था।

24. क्या केवल प्रतिभा सफलता के लिए पर्याप्त है? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : नहीं, केवल प्रतिभा सफलता के लिए पर्याप्त नहीं है। प्रतिभा के साथ निरंतर अभ्यास, अनुशासन, मेहनत और धैर्य भी आवश्यक हैं। लता जी प्रतिभाशाली थीं, किंतु उनकी सफलता का मुख्य कारण उनका अथक परिश्रम और समर्पण था।

25. लता मंगेशकर के जीवन से कौन-कौन से मूल्य सीखने को मिलते हैं?

उत्तर : लता जी के जीवन से स्वाभिमान, विनम्रता, कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन, समर्पण और आत्मविश्वास जैसे मूल्य सीखने को मिलते हैं। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों का त्याग नहीं किया। उनका जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

26. लता मंगेशकर को भारतीय संगीत की अमर स्वर-कोकिला क्यों कहा जाता है?

उत्तर : लता मंगेशकर को भारतीय संगीत की अमर स्वर-कोकिला इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपनी मधुर, सुरीली और भावपूर्ण आवाज़ से करोड़ों लोगों के हृदयों में विशेष स्थान बनाया। उन्होंने हजारों गीत गाकर भारतीय संगीत को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। उनका गायन केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम भी था। अनेक भाषाओं में गाए गए उनके गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने पहले थे। संगीत के प्रति उनकी साधना, समर्पण और निरंतर अभ्यास ने उन्हें विश्वभर में सम्मान दिलाया। उनके गीत आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित हैं, इसलिए उन्हें अमर स्वर-कोकिला कहा जाता है।

27. लता जी के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर : लता मंगेशकर का व्यक्तित्व अनेक श्रेष्ठ गुणों से युक्त था। वे अत्यंत विनम्र, स्वाभिमानी, कर्तव्यनिष्ठ और अनुशासित थीं। उन्होंने अपने पिता से आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का गुण सीखा। अपार सफलता प्राप्त करने के बाद भी उनमें अहंकार नहीं था। वे अपने प्रशंसकों और सहयोगियों के प्रति सदैव सम्मान और प्रेम का भाव रखती थीं। परिवार के प्रति उनका समर्पण भी अनुकरणीय था। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने धैर्य और साहस बनाए रखा। उनका व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का उत्कृष्ट उदाहरण है।

28. लता जी के अनुसार संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना है। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : लता मंगेशकर संगीत को ईश्वर की आराधना और आत्मा की साधना मानती थीं। उनके अनुसार संगीत में असीम शक्ति होती है, जो मनुष्य के मन और हृदय को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर जैसे महान कलाकारों के उदाहरण देकर बताया कि सच्चे मन से किया गया संगीत चमत्कारिक प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। संगीत के प्रति उनका दृष्टिकोण केवल पेशेवर नहीं था, बल्कि आध्यात्मिक था। वे मानती थीं कि संगीत में पूर्ण समर्पण, अभ्यास और एकाग्रता आवश्यक है। इसलिए संगीत उनके लिए मनोरंजन से कहीं अधिक एक साधना था।

29. संघर्षों के बावजूद लता जी ने सफलता कैसे प्राप्त की?

उत्तर : लता मंगेशकर का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और निरंतर परिश्रम करती रहीं। वे सुबह से रात तक रिकॉर्डिंग में व्यस्त रहती थीं तथा अपने कार्य के प्रति पूरी तरह समर्पित थीं। उन्होंने कठिन परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उन्हें सफलता की सीढ़ी बनाया। उनके अनुशासन, आत्मविश्वास, कर्तव्यनिष्ठा और संगीत-साधना ने उन्हें भारतीय संगीत जगत की सर्वोच्च गायिका बना दिया। उनका जीवन संघर्ष और सफलता का प्रेरणादायक उदाहरण है।

30. यदि आप लता मंगेशकर से मिलते, तो उनसे क्या सीखना चाहते और क्यों?

उत्तर : यदि मुझे लता मंगेशकर से मिलने का अवसर मिलता, तो मैं उनसे समर्पण, अनुशासन और विनम्रता का गुण सीखना चाहता/चाहती। उन्होंने अपार प्रसिद्धि और सम्मान प्राप्त करने के बाद भी सादगी और नम्रता बनाए रखी। मैं यह जानना चाहता/चाहती कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी आत्मविश्वास और धैर्य कैसे बनाए रखा। उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि सफलता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि निरंतर परिश्रम और दृढ़ संकल्प से प्राप्त होती है। मैं संगीत के प्रति उनकी साधना और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को अपने जीवन में अपनाना चाहूँगा/चाहूँगी। वे वास्तव में युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

मूल्यपरक प्रश्नों के  उत्तर

31. यदि आपके सामने स्वाभिमान और सुविधा में से किसी एक को चुनने की स्थिति आए, तो आप क्या चुनेंगे?

उत्तर : मैं स्वाभिमान को चुनूँगा/चुनूँगी क्योंकि आत्मसम्मान मनुष्य का सबसे बड़ा धन होता है। सुविधा अस्थायी हो सकती है, लेकिन स्वाभिमान जीवनभर व्यक्ति की पहचान बनाए रखता है। लता मंगेशकर ने भी कठिन परिस्थितियों में कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया और आत्मसम्मान के साथ जीवन जिया। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर मैं भी स्वाभिमान को प्राथमिकता दूँगा/दूँगी।

32. क्या प्रसिद्धि मिलने के बाद भी विनम्र बने रहना आवश्यक है? अपने विचार लिखिए।

उत्तर : हाँ, प्रसिद्धि मिलने के बाद भी विनम्र बने रहना अत्यंत आवश्यक है। विनम्रता व्यक्ति के चरित्र को महान बनाती है। लता मंगेशकर विश्वप्रसिद्ध गायिका होने के बावजूद अत्यंत सरल और विनम्र थीं। वे अपनी सफलता का श्रेय ईश्वर, माता-पिता और श्रोताओं को देती थीं। विनम्रता व्यक्ति को समाज में सम्मान दिलाती है और उसके व्यक्तित्व को और अधिक प्रभावशाली बनाती है।

33. कला और कलाकार में कौन अधिक महत्वपूर्ण है? पाठ के आधार पर तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर : कला और कलाकार दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, परंतु कला अधिक स्थायी होती है। कलाकार नश्वर होता है, लेकिन उसकी कला सदैव जीवित रहती है। लता मंगेशकर ने स्वयं कहा कि "मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं।" इससे स्पष्ट है कि कला कलाकार को अमर बना देती है। इसलिए कला का महत्व अधिक माना जा सकता है, क्योंकि वही आने वाली पीढ़ियों तक कलाकार की पहचान पहुँचाती है।

34. क्या आज के युवाओं में लता जी जैसी कर्तव्यनिष्ठा दिखाई देती है? अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर : आज भी अनेक युवा अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित और कर्तव्यनिष्ठ हैं, परंतु लता मंगेशकर जैसी दृढ़ता और निरंतरता कम देखने को मिलती है। आधुनिक जीवन में अनेक आकर्षण और विचलन मौजूद हैं। फिर भी जो युवा अनुशासन, परिश्रम और धैर्य को अपनाते हैं, वे सफलता प्राप्त करते हैं। लता जी का जीवन आज के युवाओं को अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है।

35. लता मंगेशकर का जीवन आज के विद्यार्थियों के लिए किस प्रकार प्रेरणास्रोत है?

उत्तर : लता मंगेशकर का जीवन विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का भंडार है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा और निरंतर मेहनत करती रहीं। उनका अनुशासन, स्वाभिमान, विनम्रता और कर्तव्यनिष्ठा विद्यार्थियों को सफलता का सही मार्ग दिखाती है। वे सिखाती हैं कि संघर्षों से घबराने के बजाय उनका सामना करना चाहिए। उनके जीवन से यह शिक्षा मिलती है कि दृढ़ संकल्प, परिश्रम और अच्छे संस्कारों के बल पर कोई भी व्यक्ति अपने सपनों को साकार कर सकता है।

#Notes

Class -9 Ganga : AISSE BHI BAATEN HOTA HAIN-ऐसी भी बातें होती हैं

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शब्द संपदा -Vocabulary

शब्द-संपदा : शब्द, अर्थ एवं वाक्य

1. अप्रतिम — बेजोड़, अनुपम

वाक्य: लता मंगेशकर की गायिकी भारतीय संगीत जगत में अप्रतिम स्थान रखती है।

2. आकंठ — कंठ तक, पूर्ण रूप से

वाक्य: वह देशभक्ति की भावना में आकंठ डूबा हुआ था।

3. समर्पित — समर्पण किया हुआ, दिया हुआ, सौंपा हुआ

वाक्य: एक समर्पित शिक्षक अपने विद्यार्थियों के विकास के लिए निरंतर कार्य करता है।

4. स्मरण — याद, स्मृति, चिंतन

वाक्य: स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण हमें राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा देता है।

5. रागदारी — ठीक राग गाने का ढंग या क्रिया

वाक्य: भारतीय शास्त्रीय संगीत की रागदारी परंपरा विश्वभर में प्रसिद्ध है।

6. राग — विशिष्ट ताल-लययुक्त ध्वनि, प्रीति, अनुराग

वाक्य: प्रातःकालीन राग सुनकर मन प्रसन्न हो उठता है।

7. स्वाभिमान — आत्मसम्मान, अपनी प्रतिष्ठा का अभिमान

वाक्य: स्वाभिमान मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी झुकने नहीं देता।

8. बैकुंठ — स्वर्ग, एक ताल, संगीत

वाक्य: भक्तों का विश्वास है कि सच्ची भक्ति से बैकुंठ की प्राप्ति होती है।

9. अनुयायी — पीछे चलने वाला, अनुगामी, समान

वाक्य: महात्मा गांधी के अनुयायी आज भी उनके सिद्धांतों का पालन करते हैं।

10. मार्फत / मारफत — माध्यम, ज्ञान

वाक्य: विद्यालय की सूचना अभिभावकों तक मोबाइल के मार्फत पहुँचाई गई।

11. सबब — कारण, हेतु

वाक्य: उसकी सफलता का मुख्य सबब उसका कठोर परिश्रम था।

12. अलबत्ता — निस्संदेह

वाक्य: यह कार्य कठिन है, अलबत्ता असंभव नहीं है।

13. सूत्रपात — कार्य का आरंभ

वाक्य: नई शिक्षा नीति ने शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तनों का सूत्रपात किया है।

14. आमद — आय, आगमन

वाक्य: वर्षा ऋतु के साथ प्रवासी पक्षियों की आमद बढ़ जाती है।

15. पार्श्वगायक / पार्श्वगायिका — पर्दे के पीछे से स्वर देने वाला गायक/गायिका

वाक्य: लता मंगेशकर हिंदी सिनेमा की महान पार्श्वगायिका थीं।

16. परहेज़ — किसी वस्तु से बचना

वाक्य: स्वस्थ रहने के लिए जंक फूड से परहेज़ करना चाहिए।

17. वाकया / वाकिआ — घटना, दुर्घटना

वाक्य: यह वाकया आज भी लोगों को प्रेरित करता है।

18. खैरियत — कुशल, भलाई, नेकी

वाक्य: विदेश में रहने वाले पुत्र की खैरियत जानकर माता-पिता निश्चिंत हो गए।

19. फाग — फागुन में गाया जाने वाला गीत

वाक्य: होली के अवसर पर गाँव में फाग के मधुर गीत गूँज उठे।

20. धमार — फाग का एक भेद, एक ताल

वाक्य: संगीत समारोह में कलाकार ने धमार शैली की सुंदर प्रस्तुति दी।

21. सोहर — बच्चे के जन्म पर गाया जाने वाला मंगलगीत

वाक्य: नवजात शिशु के जन्म पर महिलाओं ने सोहर गाया।

22. बधावा — मंगलाचार, बधाई, शुभ अवसर पर भेजा जाने वाला उपहार

वाक्य: पुत्री के जन्म पर रिश्तेदारों ने बधावा भेजा।

23. मसलन — उदाहरण रूप में

वाक्य: हमें महान व्यक्तियों से सीख लेनी चाहिए, मसलन डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से।

24. अप्रत्याशित — जिसकी आशा न रही हो, अनसोचा, आकस्मिक

वाक्य: प्रतियोगिता में उसकी जीत सभी के लिए अप्रत्याशित थी।

25. अतिरिक्त — आवश्यकता से अधिक, आधिक्य

वाक्य: अतिरिक्त अभ्यास से विद्यार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ता है।

26. वाजिब — उचित, कर्तव्य

वाक्य: अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का पालन करना भी वाजिब है।

27. संचित — इकट्ठा किया हुआ, जमा किया हुआ

वाक्य: वर्षों का संचित अनुभव व्यक्ति को परिपक्व बनाता है।

28. मानस — मन, चित्त, मन से उत्पन्न

वाक्य: राष्ट्रप्रेम का भाव प्रत्येक भारतीय के मानस में विद्यमान है।

29. तेजस्वी — तेजवाला, प्रतापी, शक्तिशाली, प्रभावशाली

वाक्य: स्वामी विवेकानंद एक तेजस्वी व्यक्तित्व के धनी थे।

30. टसक — चाल-ढाल का बनावटीपन, दिखावा

वाक्य: उसे अपनी सफलता का तनिक भी टसक नहीं था।

31. धनिक — धनवान, धनी, स्वामी

वाक्य: धनिक व्यक्ति को भी समाज के प्रति अपने कर्तव्य निभाने चाहिए।

32. रसद — अनाज, खाने का सामान, पता, राशन

वाक्य: सैनिकों तक समय पर रसद पहुँचाना अत्यंत आवश्यक होता है।

33. दाद देना — प्रशंसा करना, वाहवाही करना

वाक्य: कलाकार की प्रस्तुति पर दर्शकों ने खूब दाद दी।

34. साखी — गवाही, गवाह का बयान

वाक्य: इतिहास हमारी सांस्कृतिक महानता की साखी देता है।

35. लांछित — दोषयुक्त, कलंकित

वाक्य: भ्रष्टाचार से किसी भी संस्था की छवि लांछित हो जाती है।

36. हँडिया — मिट्टी का बर्तन

वाक्य: गाँव में आज भी हँडिया में भोजन पकाया जाता है।

37. खील-खील होना — सन या पटसन के रेशों से बनी डोरी की तरह बिखर जाना

वाक्य: प्रबल तूफान में पुरानी झोपड़ी खील-खील हो गई।

38. चौपाल — गाँव का सार्वजनिक बैठक-स्थल

वाक्य: गाँव के बुजुर्ग प्रतिदिन चौपाल पर एकत्र होते हैं।

39. सपन — अन्न, गहिन, वेश (पाठानुसार)

वाक्य: किसान का जीवन सपन और श्रम से जुड़ा होता है।

40. तरेड़ — दरार

वाक्य: भूकंप के कारण दीवार में तरेड़ पड़ गई।

41. जीना — सीढ़ी, सोपान

वाक्य: वह सावधानी से जीना चढ़कर छत पर पहुँचा।

#NEP Based Q&A

ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार)  प्रश्न - उत्तर (Question- Answer)

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"ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार)" नया अध्याय जोड़ा गया है, तो यह परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। साक्षात्कार-आधारित अध्याय होने के कारण इससे केवल सामान्य प्रश्न ही नहीं, बल्कि Competency Based, Case Study, Extract Based, Assertion-Reason, Value Based, HOTS, Analytical, Long Answer और NEP Pattern के प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं।

इस अध्याय से पूछे जा सकने वाले प्रश्नों के प्रकार

  1. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)
  2. लघु उत्तरीय प्रश्न (2-3 अंक)
  3. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5-6 अंक)
  4. गद्यांश/एक्सट्रैक्ट आधारित प्रश्न
  5. MCQ
  6. Assertion-Reason
  7. Competency Based Questions
  8. Case Study Based Questions
  9. HOTS (Higher Order Thinking Skills)
  10. Value Based Questions
  11. Character Sketch
  12. जीवन-मूल्य आधारित प्रश्न
  13. साक्षात्कार-शैली पर आधारित प्रश्न
  14. लेखक के उद्देश्य से जुड़े प्रश्न
  15. NEP आधारित अनुभवात्मक प्रश्न

अति महत्वपूर्ण बोर्ड-स्तरीय दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. लता मंगेशकर के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर - लता मंगेशकर का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे अत्यंत विनम्र, अनुशासित, परिश्रमी और स्वाभिमानी थीं। उन्होंने अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर से संगीत के साथ-साथ जीवन-मूल्य भी प्राप्त किए। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने आत्मसम्मान नहीं छोड़ा। परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए उन्होंने संगीत-साधना जारी रखी। सफलता के शिखर पर पहुँचने के बाद भी उनमें अहंकार नहीं था। वे अपने प्रशंसकों के प्रति कृतज्ञ थीं और अपनी उपलब्धियों का श्रेय ईश्वर, माता-पिता तथा श्रोताओं को देती थीं।

प्रश्न 2. लता मंगेशकर के जीवन पर उनके पिता के संस्कारों का क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर - पंडित दीनानाथ मंगेशकर लता जी के प्रथम गुरु थे। उन्होंने उन्हें संगीत की शिक्षा देने के साथ-साथ स्वाभिमान, अनुशासन, आत्मनिर्भरता तथा सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। लता जी ने स्वीकार किया कि उन्होंने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया और कठिन परिस्थितियों में भी आत्मसम्मान बनाए रखा। पिता के इन्हीं संस्कारों ने उन्हें जीवन के संघर्षों का साहसपूर्वक सामना करने की शक्ति प्रदान की।

प्रश्न 3. लता मंगेशकर के संघर्षपूर्ण जीवन पर प्रकाश डालिए।

उत्तर -पिता की मृत्यु के बाद परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी लता मंगेशकर पर आ गई। वे दिन-रात रिकॉर्डिंग करती थीं और एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो तक लगातार काम करती रहती थीं। उनका उद्देश्य केवल परिवार का पालन-पोषण और संगीत में उत्कृष्टता प्राप्त करना था। उन्होंने कठिन परिस्थितियों को अपनी प्रगति में बाधा नहीं बनने दिया। अथक परिश्रम और समर्पण के बल पर वे भारतीय संगीत जगत की सर्वोच्च गायिका बनीं।

Character Sketch (चरित्र-चित्रण)

लता मंगेशकर का चरित्र-चित्रण

  • महान गायिका
  • विनम्र एवं सरल स्वभाव
  • स्वाभिमानी
  • अनुशासनप्रिय
  • परिवार के प्रति समर्पित
  • परिश्रमी
  • कृतज्ञ
  • भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं से जुड़ी हुई
  • संघर्षशील
  • आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाली

Competency Based Questions

प्रश्न 1.

लता जी कहती हैं—

"मुझे अपने गाने और रिकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज़ की सुध नहीं रहती थी।"

यह कथन किस जीवन-मूल्य को व्यक्त करता है?

(A) आलस्य
(B) समर्पण
(C) अहंकार
(D) दिखावा

उत्तर

 (B) समर्पण

प्रश्न 2. यदि आज का विद्यार्थी लता मंगेशकर के जीवन से प्रेरणा लेना चाहे तो वह सबसे पहले कौन-सा गुण अपनाएगा?

उत्तर

  • अनुशासन
  • नियमित अभ्यास
  • आत्मविश्वास
  • कठिन परिश्रम

Assertion-Reason Questions

प्रश्न

Assertion (A):
लता मंगेशकर अपने पिता को अपना आदर्श मानती थीं।

Reason (R):
उनके पिता ने उन्हें स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की शिक्षा दी थी।

उत्तर - दोनों कथन सत्य हैं तथा कारण, कथन की सही व्याख्या करता है।

प्रश्न

Assertion (A):
लता मंगेशकर अभिनय के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ीं।

Reason (R):
उन्हें अभिनय की अपेक्षा गायन अधिक प्रिय था।

उत्तर - दोनों कथन सत्य हैं तथा कारण, कथन की सही व्याख्या करता है।

HOTS Questions

प्रश्न -यदि लता मंगेशकर कठिन परिस्थितियों में हार मान लेतीं, तो भारतीय संगीत जगत पर क्या प्रभाव पड़ता?

उत्तर - भारतीय संगीत जगत एक अमूल्य स्वर से वंचित रह जाता। अनेक कालजयी गीतों का सृजन नहीं हो पाता। उनकी प्रेरणादायक जीवन-यात्रा भी समाज के सामने नहीं आ पाती। इससे यह स्पष्ट होता है कि एक व्यक्ति का दृढ़ संकल्प पूरे समाज को प्रभावित कर सकता है।

प्रश्न

लता मंगेशकर ने कहा—

"मेरा गाना अमर है, शरीर अमर नहीं।"

इस कथन का जीवन-दर्शन स्पष्ट कीजिए।

उत्तर -यह कथन कर्म की अमरता को व्यक्त करता है। मनुष्य का शरीर नश्वर है, लेकिन उसके श्रेष्ठ कार्य और उपलब्धियाँ उसे अमर बना देती हैं। इसलिए व्यक्ति को ऐसे कार्य करने चाहिए जो समाज के लिए उपयोगी हों।

Case Study Based Question

केस

लता मंगेशकर ने संघर्ष के दिनों में भी अपने परिवार की जिम्मेदारियों को निभाया और संगीत-साधना जारी रखी।

प्रश्न

  1. इस प्रसंग से कौन-सा जीवन-मूल्य उभरता है?
  2. यदि आप उनकी स्थिति में होते तो क्या करते?
  3. परिवार के प्रति उत्तरदायित्व का क्या महत्व है?

उत्तर

  1. कर्तव्यनिष्ठा, समर्पण, परिश्रम
  2. मैं भी धैर्य और परिश्रम से परिस्थितियों का सामना करता।
  3. परिवार के प्रति उत्तरदायित्व व्यक्ति को जिम्मेदार और संवेदनशील बनाता है।

Extract Based Question

गद्यांश

"सबसे ज्यादा तो स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा मिली।"

प्रश्न

  1. वक्ता कौन है?
  2. स्वाभिमान की प्रेरणा किससे मिली?
  3. यहाँ कौन-सा जीवन-मूल्य व्यक्त हुआ है?
  4. इस कथन का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

  1. लता मंगेशकर
  2. पंडित दीनानाथ मंगेशकर से
  3. आत्मसम्मान
  4. व्यक्ति को परिस्थितियाँ कैसी भी हों, सम्मानपूर्वक जीवन जीना चाहिए।

प्रश्न -लता मंगेशकर के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन के लिए पाँच लक्ष्य निर्धारित कीजिए।

संभावित उत्तर

  1. प्रतिदिन नियमित अध्ययन करना।
  2. माता-पिता का सम्मान करना।
  3. किसी कला में दक्षता प्राप्त करना।
  4. आत्मनिर्भर बनना।
  5. कठिनाइयों से न घबराना।

परीक्षा में सबसे अधिक पूछे जाने की संभावना वाले प्रश्न

  • लता मंगेशकर के व्यक्तित्व की विशेषताएँ
  • पिता के संस्कारों का प्रभाव
  • संघर्ष और सफलता
  • संगीत के प्रति समर्पण
  • स्वाभिमान का महत्व
  • त्योहारों और संस्कृति के प्रति दृष्टिकोण
  •  संगीत की शक्ति
  •  "मेरा गाना अमर है" कथन का भाव
  • साक्षात्कार की विशेषताएँ
  • यतींद्र मिश्र के प्रश्नों की विशेषताएँ
  • लता मंगेशकर का जीवन विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा क्यों है?


#CHAPTER4 - Aisi Bhi Baatein Hoti Hain Sakshatkar

NCERT GANGA CLASS 9 CH-4

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Aisi Bhi Baatein Hoti Hain (lata mangeshkar se sakshatkar)

ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) 

 यतींद्र मिश्र : दीदी, आपके संगीत की अप्रतिम यात्रा पर बातचीत शुरू करते हैं... इस संवाद में मेरा प्रयास यह रहेगा कि मैं संगीत में आकंठ डूबे हुए आपके महान जीवन की उन दुर्लभ छवियों से उन करोड़ों प्रशंसकों को मिलवा सकूँ, जो आपको हर दिन सुनते हुए कहीं अपने जीवन को सार्थक ढंग से शुरू करने की प्रेरणा पाते हैं। आप अगर तैयार हों, तो मैं ऐसे असंख्य शुभचिंतकों, आपके संगीत के प्रति दीवानगी की हद तक समर्पित श्रोताओं और फिल्म-संगीत के प्रति आदर का भाव रखने वाले तमाम देशवासियों की ओर से प्रणाम करते हुए आपसे प्रश्न पूछना चाहूँगा... 

 लता मंगेशकर : जी, जरूर। आपका बेहद शुक्रिया कि आपका ऐसा कुछ करने का मन है। आप पूछिए, मैं आपके प्रश्नों का जवाब देने के लिए तैयार हूँ। मैं कोशिश करूँगी कि जो कुछ भी मैंने संगीत में रहते हुए जाना है, उसे आपको बता सकूँ। आपके माध्यम से ही मैं अपने करोड़ों प्रशंसकों का आभार व्यक्त करती हूँ, जो उन्होंने मुझे इतना प्रेम और सम्मान दे रखा है। मुझे तो यह भी लगता है कि जितना प्रेम मुझे मिला है, शायद गाकर उतना आभार मैं अपने प्रशंसकों के प्रति जता नहीं पाई हूँ... 

 यतींद्र मिश्र : आपके पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर की वे कौन-सी स्मृतियाँ हैं, जो आज भी आपके स्मरण में जीवित हैं? जिनको याद करना आपको सुख से भरता है? 

 लता मंगेशकर : कई बातें हैं। जैसे हम लोग बचपन में जब बहुत शरारत करते थे, तब पिताजी सबको बुलाकर अपने सामने खड़ा करते थे। वे बस हमको गंभीरता से देखते थे और इतने में ही हमारा रोना शुरू हो जाता था। मतलब वे कुछ कहते नहीं थे, न ही किसी बात पर डाँट पड़ती थी; मगर हम सभी समझ जाते थे कि हमको बुलाया किसलिए गया है। पिताजी उस समय पूछते थे, 'समझ गए न?' इस पर हम लोग कहते थे, 'हाँ, हम लोग समझ गए।' इसके बाद वे कहते थे कि 'अच्छा अब जाओ, बाहर जाकर खेलो।' इस तरह हमारे पिताजी का गुस्सा था, जो बिना कुछ कहे ही हम भाई-बहनों को डरा देता था। मेरे पिताजी कमाल के आदमी थे, जिन्हें मैंने हमेशा अपने काम और संगीत में डूबा हुआ ही देखा। उनकी ड्रामा कंपनी के नाटक रात नौ बजे शुरू होते थे और देर रात दो से तीन बजे तक जाकर समाप्त होते थे। इतनी देर एक नाटक में समय इसलिए लगता था कि एक नाटक के पाँच अंक होते थे। फिर उसमें लंबी लंबी रागदारी बाले गायन की भी परंपरा थी। एक बार पिताजी जब गाना शुरू करते थे, तो खूब सीटियाँ, तालियाँ और 'वन्स मोर' मिलता था। बाबा माइक पर थोड़ी तेज आवाज में गाने थे, जो सुनने पर बहुत अच्छा लगता था। मो पिताजी की एक बड़ी विशेषता यह भी थी कि वे एक राग को गाते हुए उसमें सुर बदलकर भी अपना गायन करते थे। मतलब एक राग गाते समय किसी भी सुर को 'सा' (षडज) बनाकर इस तरह राग को बदल देते थे कि वह कुछ नया हो जाता था और फिर उसी समय नए राग में गाते हुए दोबारा से पहले राग और उसके उस समय म्यूजिकल ड्रामा का बहुत चलन था। हमारे यहाँ कभी भी बिना म्यूजिक के कोई ड्रामा हुआ ही नहीं। एक नई बात मेरे पिताजी के नाटकों में यह भी थी कि वे पहली बार मराठी रंगमंच में कर्नाटक और पंजाब का संगीत लेकर आए। मतलब उन्होंने बाकायदा कर्नाटक जाकर वहाँ का कुछ गीत और संगीत सीखा था, जिसे अपने नाटकों में डाला। मुझे यह भी याद है कि जिस दिन कोई ड्रामा नहीं होता था, उस दिन घर में संगीत की सभा होती थी और बहुत सारे लोग हमारे घर आते थे। फिर वे उसमें नाटक का कोई गीत नहीं गाते थे, बल्कि उस दिन सिर्फ शास्त्रीय संगीत होता था। मेरे पिताजी के गाए हुए शास्त्रीय संगीत के कई रेकॉर्ड एच.एम.वी. से रिलीज हुए हैं और जहाँ तक मुझे याद पड़ता है कि एक रेकॉर्ड उन्होंने राग जयजयवंती का भी बनाया था, जिसे मेगाफोन कंपनी ने बाजार में उतारा। 

 यतींद्र मिश्र : पिताजी से संगीत के अलावा आपने क्या-क्या और सीखा? 

 लता मंगेशकर : सबसे ज्यादा तो स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा। उन्होंने जो संस्कार दिए उससे जिंदगी में सही बातों पर खड़े रहने की हिम्मत मिली। आज मुझे इस बात की खुशी है कि मैंने किसी से यह नहीं कहा कि आप मुझे पाँच सौ रुपये दीजिए, फलाँ चीज ला दीजिए, मुझे उसकी जरूरत है। इस तरह जो चीज मैं कर पाई, उसमें मैं अपने बाबा का संस्कार मानती हूँ। मैंने पिताजी में यह बात देखी थी कि हर हालात में कैसे रहना चाहिए। यह मेरे पिताजी ने ही मुझे सिखाया था कि अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है। इस तरह जब मैं याद करती हूँ, तो लगता है कि बाबा ऐसा कहते थे, बाबा ने यह कहा था, बाबा ने उस समय में इस तरह कोई निर्णय लिया था। यह सब मेरे बड़े काम आया है। हमने हर तरह के दिन देखे थे। पिताजी की कंपनी जब अच्छी चलती थी, तो हम सब लोग बड़े शान से रहते थे। फिर पिताजी के निधन के बाद हमें यह भी देखना पड़ा कि बुरे हालात में कैसे जीना है। मेरी माँ का भी वही संस्कार था कि कैसे भी स्वाभिमान के साथ जी लेना है, मगर किसी के आगे जाकर हाथ नहीं पसारना है.... और देखिए, ये सब बातें मेरे कितने काम आई हैं। आज मेरे पास पैसे हैं और नाम है। हम आज जहाँ रहते हैं, वह भले ही इतना छोटा-सा घर है, पर उसमें हम लोग बहुत खुश हैं। इस बात के लिए भी ईश्वर को धन्यवाद करते हैं कि बाबा ने जैसा सिखाया था, उस पर हम सभी भाई-बहनों ने चलने का प्रयास किया। 

 यतींद्र मिश्र : बचपन में आप सभी भाई-बहन फिल्में देखकर उसकी नकल उतारते थे। किसी खास फिल्म को देखकर उसकी नकल का स्मरण करेंगी? 

 लता मंगेशकर : (हँसते हुए) अरे! यह तो हम सब भाई-बहन बहुत करते थे। फिल्में ही थीं, जो मनोरंजन का एक ऐसा माध्यम थीं जिनको देखकर बच्च्चे अपने ढंग से कुछ-कुछ करते रहते थे। मुझे याद है कि प्रभात फिल्म कंपनी की एक पिक्चर थी 'संत तुकाराम'। फिल्म में दिखाया गया है कि तुकाराम सदेह बैकुंठ जाते हैं और उन्हें लेने ईश्वर का विमान आता है। वे यह गीत गाते हुए स्वर्ग जाते हैं- 'अमी जातो अमचा गावा, अमचा राम-राम ध्यावा' (मैं अपने गाँव जा रहा हूँ। सभी लोग मेरा राम-राम ले लीजिए। हम कमरे में घर भर के गद्दे, तकिये एक के ऊपर एक रखकर ऊँचा स्वर्ग बनाते थे, जिस पर चढ़कर मैं बैठती थी और वहीं से यह गीत गाती थी। नीचे कमरे में मीना, मेरे फूफा का बेटा पंढरीनाथ और आशा, ये तीनों तुकाराम के अनुयायी बनकर रोते थे और कहते थे- 'हमें भी साथ ले लीजिए। हमें भी साथ ले चलिए।' (खिलखिलाकर हँसती हैं) उस समय उषा बहुत छोटी थी, इसलिए वह इन नाटकों में नहीं रहती थी। तो यह सब होता था। हम बहुत सारी फिल्मों की नकल उतारते थे, जिनमें धार्मिक फिल्में ज्यादा होती थीं क्योंकि पिताजी धार्मिक और देशभक्ति की फिल्मों के अलावा दूसरी फिल्में नहीं देखने देते थे। उनका सख्त अनुशासन था और यह सब काम चोरी-चोरी तब होता था, जब पिताजी घर के बाहर हों और यह जान न पाएँ कि घर में फिल्मों का खेल खेला जा रहा है। 

 यतींद्र मिश्र : अगर किसी फिल्म में आपको अभिनय करने को कहा जाता, तो वह कौन-सी फिल्म होती जिसमें आप काम करना पसंद करतीं? 

लता मंगेशकर : नहीं, मैंने शुरू में तो फिल्मों में काम ही किया था और कुल छह या सात फिल्मों में किया था। मैं बहुत छोटी थी उस समय, जब फिल्मों की दुनिया में अभिनय के मार्फत ही आई। मुझे कभी अच्छा नहीं लगा मेकअप करना, लाइट के सामने जाना और काफी लोग खड़े हैं, तो उनके सामने कभी रो रहे हैं और कभी हँस रहे हैं। गा भी रहे हैं। मुझे वह कभी अच्छा नहीं लगा। अच्छी फिल्मों को देखकर सराहने का जी जरूर करता है, मगर अभिनय करने के बारे में तो सोच भी नहीं सकती। एक फिल्म हमारे यहाँ हिंदी और मराठी दोनों में बनी थी 'छत्रपति शिवाजी'। उसमें भालजी पेंढारकर थे जिन्हें मैं बाबा कहती थी। मैं उनके पास गई, हालाँकि उस वक्त तक मैंने अभिनय का काम छोड़ दिया था। मैंने उनसे खुद कहा- 'बाबा मैं चाहती हूँ कि इस फिल्म का आखिर का जो गाना है, उसमें दो लाइनें मैं भी आकर गाऊँ।' तो फिर मैंने उसके हिंदी और मराठी, दोनों ही संस्करणों में बाद की दो पंक्तियाँ गाई हैं, जिन दृश्यों में मैं मौजूद भी हूँ। मैं छत्रपति शिवाजी को बहुत पसंद करती हूँ, इसलिए बस इसी फिल्म के लिए मेरा मन हुआ कि भले ही एक दृश्य में सही, मगर यहाँ रहा जा सकता है। यतींद्र मिश्र : उस दौर में आपके काम की परिस्थितियाँ कैसी थीं? क्या वे आपके हिसाब से धीरे-धीरे अनुकूल होती गईं अथवा वैसे ही हमेशा की तरह एक चुनौती का सबब बनी रहीं, जैसे कि वे संघर्ष के दिनों में थीं? लता मंगेशकर : यह कह पाना मुश्किल होगा कि मेरी परिस्थितियाँ कभी बहुत अच्छी या बुरी रही हों। मैं इन सब बातों पर ध्यान नहीं देती थी। अलबत्ता मैं उस जमाने से लेकर बाद तक बहुत मेहनत से अपने काम करती थी। मुझे याद है कि मेरी रेकॉर्डिंग सुबह से रात तक चलती रहती थी। एक स्टूडियो से दूसरे और तीसरे स्टूडियो के चक्कर में ही पूरा दिन बीत जाता था। मुझे अपने गाने और रेकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज की सुध नहीं रहती थी। हमेशा यही बात दिमाग में घूमती थी कि किसी तरह बस मुझे अपने परिवार को देखना है। फिर वह रेकॉर्डिंग का वक्त हो या घर का खाली समय। किस तरह मैं अपने परिवार के लिए ज्यादा से ज्यादा कमाकर उनकी जरूरतें पूरी कर सकती हूँ, इसी में सारा वक्त निकल जाता था। आप मेरी परिस्थितियों के बारे में पूछ रहे हैं, तो सच बात तो यही है कि मुझे रेकॉर्डिंग से या उसकी तकलीफों से इतना फर्क नहीं पड़ता था, जितना इस बात से कि आने वाले कल में मेरे कितने गीत रेकॉर्ड होने हैं। फलाँ फिल्म के खत्म होने के साथ मुझे नए कॉन्ट्रेक्ट की दूसरी नई फिल्मों के गाने कब रेकॉर्ड करने हैं। 

यतींद्र मिश्र : बचपन का कोई ऐसा सपना जिसे पूरा करने की हसरत मन में बहुत दिनों तक पलती रही हो? 

लता मंगेशकर : ऐसा कोई सपना तो खास नहीं है, मगर आपको बचपन की एक बात बताती हूँ। मेरे पिताजी उस समय जीवित थे और जब वे अपने कार्यक्रमों के लिए तैयार होते थे, तो उनको जितने मेडल मिले थे, वे अपने कपड़ों पर सीने के बाईं तरफ लगाते थे। वह जमाना ऐसा था, जिसमें यह प्रचलन रहा कि कलाकार लोग अपने प्रदर्शनों में मिले हुए मेडल पहनकर ही बैठते थे। मुझे जगह तो याद नहीं है, मगर यह ठीक से याद है कि पिताजी के अलावा बाहर के किसी कलाकार को जो सबसे पहले मैंने गाते हुए सुना है, वह पंडित कुमार गंधर्व थे। कुमार गंधर्व जी जब काली शेरवानी पहनकर और अपने ढेर सारे मेडल लगाकर गाने के लिए बैठे, तो वह बात मुझे बहुत पसंद आई। मुझे तब हमेशा यह लगता था कि जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तब मुझे भी ऐसे ही मेडल मिलेंगे, जिसे लगाकर किसी कार्यक्रम में जाऊँगी। 

यतींद्र मिश्र : अगर हम समय के चक्र (टाइम मशीन) को घुमाकर सन् 1949-50 में ले जाएँ, तो आपके फिल्मों से संबंधित सांगीतिक जीवन की शुरुआत में खेमचंद प्रकाश, शंकर-जयकिशन, हुस्नलाल-भगतराम जैसे म्यूजिक डायरेक्टर आते हैं और आपको एक मजबूत जमीन बनाने के लिए, 'आएगा आने वाला' (महल), 'हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का' (बरसात) और 'चले जाना नहीं नैन मिला के' (बड़ी बहन) जैसे गाने मिलते हैं। इससे एक एक नए युग का सूत्रपात होता है, जो कहीं आपके कद को बड़ा बनाने में मददगार रहता है। मैं यह जानना चाहता हूँ कि यदि उस जमाने में ए.आर. रहमान आए होते, जतिन-ललित आए होते, शंकर-एहसान-लॉय होते, तो ये सारे गाने कैसे बनते? उस समय 'आएगा आने वाला' की आमद कैसी होती? 

लता मंगेशकर : (हँसते हुए) बड़ा मजेदार प्रश्न है आपका। कहना मुश्किल है इस पर क्या बोलूँ? समझ में नहीं आ रहा है कि वाकई अगर ऐसा हुआ होता, तो ये गाने कैसे बनते। यह विचार और कल्पना तो सुनने में अच्छी लगती है, पर मैं पूरी तरह इसका आकलन नहीं कर सकती कि 'आएगा आने वाला' को ए.आर. रहमान ने बनाया होता या 'हवा में उड़ता जाए' को जतिन-ललित ने, तो कैसा प्रभाव पैदा होता।... मगर मैं इतना जरूर जानती हूँ कि कुछ बहुत बढ़िया होता या बिल्कुल दूसरे अंदाज में सामने आता, जिसकी शायद धुनें और तर्ज भी अलग होते। मैं आपसे प्रश्न करती हूँ कि जो मेरे गाने रहमान ने बनाए या जतिन-ललित के लिए मैंने 'मेरे ख्वाबों में जो आए' (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे) गाया है, उसे श्याम सुंदर जी, नौशाद साहब या अनिल विश्वास ने रचा होता, तो आपके लिहाज से वह किस तरह बनता? यह वाकई बहुत रोचक और सोचने वाली बात है कि समय के हेर-फेर से हमारे गीतों का स्वभाव कैसा होता? इतना जरूर मैं कहना चाहूँगी कि पुराने समयों में, जब मैंने 'महल', 'बड़ी बहन', 'बरसात', 'तराना', 'बाजार' और 'संगदिल' जैसी फिल्मों के लिए पार्श्वगायन किया था, उस समय तकनीकी रूप से सिनेमा में बहुत तरक्की नहीं हुई थी। 'आएगा आने वाला' में मुझे हॉल में बहुत दूर से चलकर दबे पाँव रेकॉर्डिंग वाले माईक तक आना पड़ता था और उसी अनुपात में रेकॉर्डिंग के माईक पर स्वर का उतार-चढ़ाव कैद किया जाता था। f बहुत सारे ऐसे गाने मुझे याद हैं जिसमें कुछ विशेष प्रभावों को देने के लिए अनिल विश्वास, श्याम सुंदर, सज्जाद हुसैन, सलिल चौधरी और सी. रामचंद्र ने कुछ नए तरीके और अजीबोगरीब टोटके आजमाए थे, जिनसे गीतों में वह प्रभाव पैदा हो सका। आज, जो स्थिति है और जिस तरह हमारी तकनीक विकसित हो चुकी है, उसमें अगर इन लोगों को काम करने का मौका मिलता, तब तो कमाल ही हो गया होता। न जाने कितना और अधिक एडवांस किस्म का ये लोग संगीत रच पाते, आप सोच सकते हैं। ठीक उसी तरह, जैसा सुंदर और स्तरीय संगीत आज के संगीतकार बना रहे हैं रहमान, जतिन-ललित और तमाम अन्य लोग - अगर पीछे जाकर काम करते, तो कितनी मुश्किलें आतीं और कितना संघर्ष करते हुए वे सब अपना गाना बनाते, इसका अंदाजा भी लगाया जा सकता है। मेरे लिए भी यह कम चुनौती की बात नहीं कि मैं अनिल विश्वास की धुनों जैसा काम रहमान के साथ कर रही होती और उसी तरह इन नए लोगों की धुनों पर नौशाद साहब के लिए रेकॉर्ड करती, तो कैसा होता? 

यतींद्र मिश्र : इसी समय विषय परिवर्तन करते हुए आपसे कुछ व्यक्तिगत सवाल पूछने का मन हो रहा है। इस संदर्भ में आपके व्यक्तित्व को देखते हुए यह बात दिमाग में आती है कि आपने रंगों से हमेशा परहेज किया है। विशेषकर अपने पहनावे में भी इस बात का ध्यान रखा कि कहीं से भी रंगों की कोई भी दर्शना अभिव्यक्त न हो सके। आपकी सफेद रंग की साड़ियों 1 पर मौजूद रंगीन धारियाँ, गुलबूटों और पल्लों का रंग छोड़कर कहीं भी रंग से दोस्ताना निभता नहीं दिखता। ऐसे में एक ख्याल मन में आता है कि आप रंगों का त्योहार होली कैसे मनाती होंगी? होली को लेकर कोई संस्मरण या व्यक्तिगत रुचि की कोई बात जो आप यहाँ साझा करना चाहें। लता मंगेशकर : हम होली खेलते थे। यह बहुत पहले की बात है, जब मेरे पिताजी जीवित थे। आजकल तो मैंने होली खेलना ही बंद कर दिया है। पहले सारा दिन रंग खेलना और भीगना और बाद में जाकर देर शाम तक नहाना, अब यह सब सालों से अच्छा नहीं लगता है। यह जो होली पूरे देश में प्रचलित है, हम उसे होली की तरह नहीं मनाते थे। मेरा मतलब यह है कि होली के एक दिन पहले जब होली जलाते हैं और उस समय होलिका की पूजा होती है, उसमें जो प्रसाद चढ़ाया जाता है, उन तमाम तरह की मिठाइयों को होलिका में डालते हैं। नारियल भी होलिका में आखिरी में जलाया जाता है, जिसे जल जाने के बाद आग से निकालकर उसे तोड़कर प्रसाद लेते हैं। वह जो राख बनती है, उसे उठाकर दूसरे दिन एक-दूसरे पर डालते हैं। इसे हम लोग 'गुड़वड़' कहते हैं। होली के बाद पाँचवें दिन रंग-पंचमी आती है, उस दिन मेरी माँ और पिताजी हम सब भाई-बहनों पर केसर घोलकर थोड़ा छिड़कते थे। माँ घर में कुछ मीठा बनाती थीं, जो भगवान को चढ़ाकर हमें प्रसाद में खाने को मिलता था। हम सभी की अलग-अलग आरतियाँ भी माँ उतारती थीं और इस तरह हमारे घर में बचपन में होली का त्योहार मनता था। यह होली जो आजकल प्रचलित है, इसका कोई प्रभाव हमारे घर में नहीं था। हमारे यहाँ दशहरा और दीवाली का ज्यादा महत्व था। नवरात्रि भी बहुत धूमधाम के साथ हम लोगों के यहाँ मनती है। नवरात्रि के पहले दिन हम 'गुड़ि पड़वा' मनाते हैं, जिसका विशेष महत्व है। इसमें हम घर में बाहर 'गुड़ि' बाँधते हैं और कलश स्थापना करते हैं। सूर्योदय के समय ही 'गुड़ि' पर बताशों की माला या हार बनाकर चढ़ाई जाती है, जिसे सूर्यास्त होने तक उतार लिया जाता है और प्रसाद के रूप में घर के सभी सदस्य उसे लेते हैं। यह एक बहुत महत्वपूर्ण आयोजन है हमारी तरफ और ऐसी मान्यता है कि भगवान राम चौदह वर्ष बाद जब अयोध्या लौटे थे, तो हर घर में ऐसे ही बताशों की लड़ी सजाकर 'गुड़ि' बाँधी गई थी। महाराष्ट्र में ऐसा ही कहा जाता है। पहले दिन 'गुड़ि' बाँधने के बाद नौ दिन तक उत्सव मनाया जाता है, जिसके अंत में नवमी पर राम जी के जन्म की तिथि रामनवमी आती है।तो यह त्योहार हम राम आगमन मानकर मनाते हैं, जबकि बाकी जगहों पर दुर्गा की आराधना में नवरात्र होता है। महाराष्ट्र में उस तरह नवरात्र नहीं मनता, जिस तरह गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में दुर्गा की आराधना में यह त्योहार मनाया जाता है। 

यतींद्र मिश्र : त्योहारों की ऐसी कोई खास बात, जो आपके शुरुआती जीवन में परंपरा की तरह निभती रही हो और जिसे आपने बाद में भी पूरी आत्मीयता के साथ निभाना जारी रखा। 

 लता मंगेशकर : ऐसी कोई खास बात मुझे याद नहीं आती। अलबत्ता इतना जरूर कहूँगी कि पचास का दशक रहा होगा, जब मैं फिल्म इंडस्ट्री में नई-नई आई थी और मेरा काम कुछ चल निकलना शुरू हुआ था। उस दौरान मैंने कुछ सालों तक दीवाली के दिन अपने सीनियर म्यूजिक डायरेक्टर्स के यहाँ मिठाई लेकर जाने का चलन शुरू किया था। आप सुनकर हैरान होंगे कि मैं ऐन दीवाली के दिन तड़के पाँच बजे ही नहा-धोकर बहुत सारे संगीतकारों के घर मिठाई लेकर पहुँच जाती थी। एक बार बड़ा मजेदार वाकया हुआ कि मैं नौशाद साहब के घर सुबह करीब साढ़े पाँच बजे पहुँच गई और जब कॉलबेल बजाया, तो उनींदे से नौशाद साहब मुझे गेट पर खड़ा देखकर डर गए। वे डरकर पूछने लगे- "लता बाई सब खैरियत तो है, इतने सबेरे क्या मुसीबत आन पड़ी?" मैंने उन्हें हँसकर कहा, "कुछ नहीं नौशाद साहब, आज दीवाली है तो आपको बधाई देने और मिठाई पहुँचाने चली आई।" इस पर वे बोले, "अरे इतनी सुबह क्यों परेशान हुई?" तब मैंने उनको हँसते हुए जवाब दिया कि नौशाद साहब आपके अलावा मुझे अभी दो-तीन जगह- अनिल विश्वास जी, रोशनलाल, मदन भैया और बर्मन दादा के यहाँ भी जाना है। इस पर वे लाड़ से भरकर बोले- "हाँ। मैं बिल्कुल भूल गया! लेकिन पहले बैठो, चाय पियो और मुँह मीठा करो, फिर जाने देंगे। फिर बोले, "लता, तुम हम सबको मिठाई बाँट रही हो लेकिन हम सारे संगीतकारों को मिलकर तो तुम्हें मिठाई खिलानी चाहिए, जो तुमने हमारी धुनों में इतनी मिठास घोली है।" नौशाद साहब से मैंने यही इतना भर कहा कि आप आशीर्वाल दीजिए कि आगे भी जीवन में हर दीवाली के साथ मैं और मधुर से मधुर गीत गा सकूँ। यतींद्र मिश्र : त्योहारों के संदर्भ में एक बात और ध्यान में आती है कि अधिकांश प्रदेश में पर्वों व अनुष्ठानों से संदर्भित घर-घर गीत गाए जाने का प्रचलन रहा है। उदाहरण के लि होली के मौके पर फाग और धमार, बिहार में छठ पूजा पर छठ के गीत, जन्माष्टमी रामनवमी में ईश्वर के जन्म के कारण सोहर और बधावा आदि गाने का मामला। ये गी ज्यादातर घर और मोहल्ले की स्त्रियाँ ही गाती हैं, गायन एक रिवाज की तरह कायम है। में महाराष्ट्र के संदर्भ में आपके देखे ऐसे कौन-से अवसर आए हैं?लता मंगेशकर हँसते हुए) हमारे यहाँ होली और दीवाली पर तो इस तरह घरों में गीत नहीं होता। यह जरूर है कि विवाह के बाद जब नई बहू घर में आती है, तब एक पूजा होती है घरों में, जिसमें पास-पड़ोस की बहुत सारी औरतें आती हैं। यह मंगलागौर कहलाता है। सारी औरतें बिल्कुल मुग्ध भाव से गीत गाती हैं और नाचती भी भी हैं। बिल्कुल ठेठ गँवई अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है, मगर आहिस्ता आहिस्ता वह भी अब खत्म हो रहा है। मुझे अच्छी तरह से याद है; जब मैं बहुत छोटी थी, तब घर-परिवार या पड़ोस में किसी की भी शादी के बाद यह मंगलागौर मनाया जाता था और हम सभी लोग उसमें खूब नाचते-गाते थे। उनमें स्त्रियाँ नौटंकी और तमाशा की तरह भी कुछ-कुछ करती थीं। मतलब कोई कुछ भी रूप धरकर नाचता था। पो कर ? 

 यतींद्र मिश्र : दीदी, कोरस में गाने वाली लड़कियों के साथ आपके कैसे रिश्ते रहे? क्या वे सब भी आप लोगों की गायिकी में कोई सहयोग करती थीं या उनका एक अलग ही विभाग होता था, जो मुख्य पार्श्वगायक-गायिकाओं से अलग रहता था? है। यो हो, री द 

  लता मंगेशकर : उस वक्त एक ऐसा ग्रुप था, जो सब जगह जाता था। नौशाद साहब के यहाँ, मदन मोहन जी के यहाँ। शंकर-जयकिशन, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल - ये जितने भी लोग थे; सभी के यहाँ एक ही ग्रुप की लड़कियाँ थीं, जो कोरस में गाने जाती थीं। इसलिए सबसे मेल-मुलाकात भी गहरी पहचान में बदल गई थी। मेरा कोरस की लड़कियों के साथ बहुत अच्छा संबंध था। मतलब जितनी भी लड़कियाँ थीं, वो बिल्कुल मेरे घर जैसी थीं। सबका ही घर में आना-जाना होता था। मीना की शादी जब कोल्हापुर में हुई, तो कोरस की सारी लड़कियाँ और लड़के वहाँ आए थे और उन लोगों ने वहाँ खूब गाने गाए और डांस किया था। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, सन् 1960 में जो ग्रुप कोरस गाने वालों का हमें मिला था, वह लगभग अस्सी तक वैसे ही चला है। 1980 के पास जाकर वह बदला गया। फिर उनमें कुछ लड़कियों ने गाना बंद कर दिया था और कुछ लोगों ने छोड़ दिया। ए फिर अस्सी के बाद तो यह भी हो गया था कि कोरस वालों का म्यूजिक पहले रेकॉर्ड हो जाता था। बाद में हम लोग जाकर अपने गाने गा आते थे। उससे पहले के दौर में पुरुष और स्त्री आवाज़ों के कोरस हम लोगों के गीतों के साथ ही रेकॉर्ड होते थे। भले ही वह गाना डुएट हो या फिर कोई सोलो सांग। अकसर मुकेश भैया और मेरे गाने या किशोर कुमार और मेरे गानों में कोरस की लड़कियाँ साथ ही गाती थीं। उनमें से कुछ के नाम तो मुझे अभी भी याद हैं। कुछ एक लड़कियाँ बहुत सुरीला गाती थीं, जिनमें कविता, गांधारी, कल्याणी, सुमन और रेखा थीं। यह सब मुझे बड़ी भली और अच्छी लगती थीं। कविता और गांधारी बहनें थीं और दोनों साथ ही कोरस में गाती थीं। रेखा शादी-शुदा बाल-बच्चों वाली औरत थी, जो अच्छी तरीके से कोरस में साथ देती थी। कल्याणी की भी आवाज़ सुंदर थी। यह सब इतनी भली थी कि जब रेकॉर्डिंग के लिए आती थीं, तो अकसर वहाँ स्टूडियो में ज्यादा कुर्सियाँ नहीं होती थीं। वे सब बड़े मजे से जमीन पर बैठती थीं और अकसर मैं भी रेकॉर्डिंग में आकर वहीं जमीन पर बैठकर उन सभी के साथ बातें करती थी। यह मैं उन कोरस गाने वाली लड़कियों की बात कर रही हूँ, जो बहुत शुरुआती दौर में लगभग पचास और साठ के दशक में संगीतकारों के यहाँ कोरस गाने के लिए जाती रही हैं। आजकल का मुझे कुछ मालूम नहीं है। अब कौन-कौन से लोग हैं और उनका सिंगर्स के साथ में गाना रेकॉर्ड होता है या अलग से? यह मुझे मालूम नहीं है। मुझसे मिलने वाले जितने लड़के और लड़कियाँ थीं, उन सबने बहुत बाद तक संपर्क बनाया हुआ था।

 यतींद्र मिश्र : संगीत की प्राचीन परंपरा में बहुत सारी जनश्रुतियाँ और कहानियाँ संगीत को गरिमा और शिखर देने के संदर्भ में कही जाती रही हैं या हम इस तरह कह सकते हैं कि परंपरा में व्याप्त रही हैं। मसलन स्वामी हरिदास और तानसेन के युग की बहुत सारी कथाओं में यह मान्यताएँ भी प्रचलित रहीं कि तानसेन के दीपक राग गाने से दीये जल उठे या कि उनकी पुत्रियों ताना-रीरी के मेघ राग गाने से वर्षा होने लगी। इस तरह की अवधारणाओं पर आप किस तरह सोचती हैं? 

 लता मंगेशकर : यह जिस जमाने की कथाएँ हैं, जिसमें हरिदास बाबा और तानसेन जैसे महान संगीतकारों के लिए ऐसा कहा गया, तो हो सकता है कि उनकी कला में कोई सच्चा सुर या आत्मा की आवाज़ लगी होगी, तो ऐसा कुछ घट गया होगा, ऐसा हम आदर में मान लेते हैं। परंतु यह निश्चित ही हुआ होगा, यह कम से कम मैं नहीं कह सकती क्योंकि ऐसा मेरा कोई अनुभव नहीं है। हालाँकि मैं यह मानती हूँ कि संगीत में वह असीम शक्ति है कि कुछ अप्रत्याशित वह जरूर रच देता है, जिसका अनुभव भी कई बार हमें हुआ है। कई बार अपने बाबा पंडित दीनानाथ मंगेशकर को सुनते हुए भी मैं कुछ अप्रत्याशित अनुभव करती थी। आपको एक वाकया बताती हूँ। मैं मुंबई में उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर का एक कंसर्ट सुन रही थी। मैं श्रोताओं की पंक्ति में बिल्कुल आगे बैठी अली अकबर भाई का वादन सुन रही थी और वे अत्यंत मंत्रमुग्ध किस्म का वादन कर रहे थे। तभी कुछ समय बीता होगा, मसलन पचास-साठ मिनट कि 'ठन' से उनके सरोद का एक तार टूटा और उन्हें बजाना बंद करना पड़ा। जब वे उठकर पीछे ग्रीन रूम में गए, तो उनसे मिलने मैं भी वहाँ गई। मैंने बोला, "आप बहुत सुंदर बजा रहे थे, काश कि यह तार न टूटता और हम पूरी तरह राग को अंत तक सुन पाते।" इस पर अली अकबर भाई ने एक बड़ी मार्मिक बात कही, जो आज तक मुझे भूलती नहीं। वे बोले- "बहन, जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।" उन्होंने अपने सुर को इतने पवित्र भाव से इतना डूबकर लगाया कि सरोद का तार टूट गया। इस प्रसंग से मुझे यह लगता है कि संगीत की सीमा इतनी अनंत है कि तार भी शुद्ध स्वर के आघात को सह नहीं पाता, टूटकर अलग हो जाता है। आज जब उस्ताद अली अकबर खाँ या पंडित रविशंकर के संदर्भ में इन बातों को सोचती हूँ, तो इस बात पर विश्वास करने का मन होता है कि हो सकता है मियाँ तानसेन से कोई ऐसा सच्चा सुर जरूर लगा होगा कि बारिश हो गई या दीपक जल उठे ! यतींद्र मिश्र : दीदी, आप तो घर-घर में व्याप्त हैं। आपकी आवाज़ से लोगों की सुबह होती है। अगर मैं अतिरेक नहीं कर रहा, तो यह कहना वाजिब है कि आप अमर हैं और दूसरी लता मंगेशकर होना इस दुनिया में संभव नहीं है.... लता मंगेशकर : मुझे भगवान ने बहुत कुछ दिया है। मुझे किसी बात की शिकायत नहीं है। मैं बहुत खुश हूँ। आप जैसे लोग अगर यह मानते हैं कि मैं अमर हूँ, तो यह मुझे मिलने वाले उस प्यार जैसा ही है, जो दुनिया ने मुझे दिया है।... मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं। उसे तो जाना ही है, आज नहीं तो कल। कल नहीं तो परसों या किसी न किसी दिन...। इस बात पर मुझे कोई अफसोस नहीं होता। वह तो होकर रहेगा। हमारे यहाँ यही कहा जाता है- 'गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन'। मतलब गाँव तो बह जाता है, लेकिन जो नाम है, वह रह जाता है। मैं इसको हमेशा से मानती रही हूँ। एक बात की मुझे सबसे ज्यादा खुशी है कि मैंने अपने पिताजी का नाम, थोड़ा ही सही मगर, आगे बढ़ाया। आज मुझे लगता है कि हे प्रभु! तुमने जो भी दिया, वह बहुत दिया, दूसरों से कहीं ज्यादा दिया। अपनी कृपा की छाया से जैसे मुझे छाँह दी है, वैसे ही हर एक कलाकार और नेक इंसानों के ऊपर भी रखना... यही प्रार्थना है।