PADHNA LIKHNA

Mera Chhota Sa Niji Pustakalaya (मेरा छोटा सा निजी पुस्तकालय)

#Detailed Summary

विस्तृत सारांश (Detailed Summary):

यह पाठ लेखक धर्मवीर भारती के किताबों के प्रति अनन्य प्रेम की कहानी है।

1. बचपन का साहित्यिक माहौल:
लेखक के घर में बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई का माहौल था। उनके पिता नियमित रूप से 'आर्य मित्र' और 'स्वराज्य' जैसे पत्र-पत्रिकाएँ मँगाते थे। लेखक के लिए 'बाल सखा' और 'चमचम' जैसी पत्रिकाएँ आती थीं। यहीं से उनमें पढ़ने की ललक जागी। उनके पिता ने घर में ही एक छोटी सी लाइब्रेरी बना रखी थी।

2. पहली पुस्तक का रोमांच:
लेखक ने अपनी पहली किताब 'शशिशेखर' तब खरीदी थी, जब उनके पास फिल्म 'देवदास' देखने के लिए पैसे थे। लेकिन माँ के समझाने पर उन्होंने फिल्म देखने के बजाय वह किताब खरीदी। उस दिन उन्हें जो खुशी मिली, वह किसी फिल्म से कहीं बढ़कर थी। यहीं से उनके निजी पुस्तकालय की नींव पड़ी।

3. लाइब्रेरी का विस्तार:
जैसे-जैसे लेखक बड़े हुए, उन्होंने अपनी पॉकेट मनी बचाकर और पुरानी किताबें बेचकर नई किताबें खरीदना शुरू किया। उनके पास साहित्य, इतिहास, दर्शन और कला की हज़ारों किताबें जमा हो गईं। वे किताबों को केवल पढ़ते नहीं थे, बल्कि उन्हें सहेजकर रखना अपना कर्तव्य समझते थे।

4. मृत्यु से संघर्ष और किताबों का साथ:
1989 में लेखक को दो बार हार्ट अटैक (दिल का दौरा) आया। डॉक्टरों ने उन्हें बिल्कुल आराम करने को कहा था। उस समय उनके पास केवल उनकी किताबें थीं। लेखक कहते हैं कि उन किताबों की उपस्थिति ने उन्हें अकेलेपन से बचाया और उनमें जीने की इच्छा (Will to live) जगाई। वे किताबों को अपने 'सगे-संबंधियों' से बढ़कर मानते थे।

निष्कर्ष:
यह पाठ हमें सिखाता है कि किताबें मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र होती हैं। वे न केवल ज्ञान देती हैं, बल्कि कठिन समय में मानसिक संबल भी प्रदान करती हैं।