PADHNA LIKHNA

माता का अँचल (शिवपूजन सहाय)

#Detailed Summary

विस्तृत सारांश (Detailed Summary):

यह पाठ लेखक के बचपन की यादों का एक मधुर संकलन है। इसमें 1930 के दशक के ग्रामीण जीवन और बच्चों की सरलता का वर्णन है।

1. पिता के साथ गहरा लगाव:
लेखक का बचपन का नाम तारकेश्वर नाथ था, लेकिन उनके पिता उन्हें प्यार से 'भोलानाथ' कहते थे। भोलानाथ का ज्यादातर समय अपने पिता के साथ बीतता था। वे पिता के साथ ही सोते, सुबह जल्दी उठकर उनके साथ नहाते और पूजा में बैठते थे। पिता उनके माथे पर भभूत का तिलक लगाते थे, जिससे वे 'बम भोला' लगने लगते थे।

2. खेल और शरारतें:
पूजा के बाद पिता उन्हें अपने साथ गंगा किनारे ले जाते, जहाँ वे कागज़ की पर्चियों में लिपटी राम-नाम की गोलियाँ मछलियों को खिलाते थे। वापस आते समय वे पिता के साथ पेड़ों की डालियों पर झूला झूलते और कुश्ती लड़ते थे। भोलानाथ अपने मित्रों के साथ मिट्टी के घरौंदे बनाना, खेती करना, बारात निकालना और मिठाई की दुकान सजाना जैसे खेल खेलते थे। इन खेलों में ग्रामीण संस्कृति की झलक मिलती है।

3. साँप वाली घटना और डर:
एक दिन बच्चे चूहे के बिल में पानी डाल रहे थे, तभी अचानक वहाँ से एक साँप निकल आया। बच्चे डरकर बेतहाशा भागे। कोई गिरा, किसी का सिर फूटा, किसी के दाँत टूटे। भोलानाथ भी लहूलुहान होकर घर की ओर भागे।

4. माँ की गोद का महत्व:
रास्ते में उनके पिता खड़े थे, उन्होंने भोलानाथ को पुकारा और गोद में लेना चाहा, लेकिन भोलानाथ पिता की गोद के बजाय सीधे माँ की गोद में जाकर छिप गए। माँ ने उन्हें आँचल से ढँक लिया, उनके घावों पर हल्दी लगाई और उन्हें सीने से चिपका लिया। पिता के साथ अटूट प्रेम होने के बाद भी, संकट के समय उन्हें सबसे अधिक सुरक्षा माँ के आँचल में महसूस हुई। इसी कारण पाठ का नाम 'माता का अँचल' रखा गया है।